Vikram 1: 10 साल की मेहनत, 7 मंजिला ऊंचा रॉकेट; ISRO के 2 पूर्व वैज्ञानिकों के जुनून की कहानी, National Hindi News


फ्लिपकार्ट के सह-संस्थापक बिन्नी बंसल ने कंपनी में निवेश के लिए सबसे पहले भरोसा जताया। कंपनी ने 5.1 और छह करोड़ डॉलर की फंडिंग जुटाई और इसके बाद कंपनी अपने रास्ते पर आगे बढ़ चली।

ISRO Mission Vikram 1: मिशन आगमन के तहत विक्रम-1 रॉकेट की सफलता के पीछे इसरो के दो पूर्व वैज्ञानिकों का जुनून अहम है। पवन चंदाना और नागा भरत डाका की दस साल की मेहनत की बदौलत ही अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत ने ये कामयबी हासिल की है। स्काईरूट के शुरू होने के बाद वर्ष 2020 में कोरोना महामारी के कारण कंपनी पर सकंट के बादल गहरा गए। इसके बावजूद दोनों वैज्ञानिकों ने हार नहीं मानी और पूरी शिद्दत से अपने सपने को साकार करने में जुटे रहे।

ई-कॉमर्स वेबसाइट फ्लिपकार्ट के सह-संस्थापक बिन्नी बंसल ने कंपनी में निवेश के लिए सबसे पहले भरोसा जताया। कंपनी ने 5.1 और छह करोड़ डॉलर की फंडिंग जुटाई और इसके बाद कंपनी अपने रास्ते पर आगे बढ़ चली। स्काईरूट कंपनी के सीईओ पवन चंदाना आईआईटी खड़गपुर से पढ़े हैं। इसरो में रहते हुए देश के सबसे शक्तिशाली लॉन्च व्हीकल जीएसएलवी मार्क-3 पर काम किया। तिरुवनंतपुरम स्थित विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर में छह वर्षों तक काम करते हुए उन्हें रॉकेट डिजाइन का अच्छा अनुभव है।

इसरो में बड़े प्रोजेक्ट पर बेहतर काम के लिए इन्हें इंटरनल इनोवेशन अवॉर्ड भी मिला। स्पेस और रॉकेट चंदाना का जुनून है। वहीं नागा भरत डाक आईआईटी मद्रास से पढ़े हैं। कंपनी के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर हैं। इनके नेतृत्व में एक हजार से अधिक लोगों की टीम रॉकेट डिजाइन, प्रोपल्शन और लॉन्च सिस्टम्स पर काम कर रही।

ढाई साल पहले आया था सामने

ईरूट ने अक्तूबर 2023 में विक्रम-1 लॉन्च व्हीकल को दुनिया के सामने पेश किया था। वर्ष 2022 में कंपनी ने 18 नवंबर 2022 को सब- ऑर्बिटल रॉकेट पहली बार छोड़ा था।

सात मंजिल ऊंचा रॉकेट

विक्रम-1 रॉकेट सात मंजिला भवन की ऊंचाई के बराबर है। ये पूरी तरह कार्बन कंपोजिट से बना है। इसमें थ्री- डी प्रिंटेड इंजन और हाई थ्रस्ट सॉलिड फ्यूल बूस्टर लगा है। रॉकेट पृथ्वी की निचली कक्षा में परिक्रम करने वाले 350 किलोग्राम वजनी उपग्रह ले जाने में सक्षम है। पहली उड़ान में रॉकेट 60 डिग्री कोण के साथ 450 किलोमीटर दूर गया।

भारत को ऐतिहासिक मुकाम

‘आगमन’ के तहत अमेरिका, चीन के बाद भारत ऐसा करने वाला दुनिया का तीसरा देश बन गया है। मिशन से दुनियाभर में बढ़ रही छोटे उपग्रहों के प्रक्षेपण की मांग पूरी करने की दिशा में भारत अहम भूमिका निभा सकता है।



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