पीढ़ियों का अंतर।मैं अपने छात्रों से कहता हूं कि हमारे दौर में जो आगे बढ़ गए और जो पीछे छूट गए, उनमें अंतर था। हमें हमारी डिग्रियों की वजह से तरक्की मिली। शुरुआती नौकरियों से ही इतना वेतन मिला कि इनकम टैक्स के दायरे में आ गए। दूसरे नहीं आ पाए, क्योंकि उनकी कमाई इतनी नहीं थी।
एक जैसी समस्या।अब हालात बदल चुके हैं। देश में कोई Gen Z अपनी पहली सैलरी पर इनकम टैक्स नहीं देता। उनकी कमाई ही इतनी नहीं है। इसी वजह से इस पूरी पीढ़ी में एकजुटता है, भले उनमें से किसी ने ITI किया हो और कोई IIT से निकला हो। समृद्धि की कमी आम समस्या है। मौजूदा प्रदर्शन इसी बात को दिखाता है।
राजनीति से नाराजगी।1970 के दशक के नवनिर्माण आंदोलन के बाद यह पहला बड़ा आंदोलन है। यह जाति, धर्म, सम्प्रदाय, किसी प्रफेशन या किसी एक मुद्दे को लेकर नहीं खड़ा हुआ। इसके केंद्र में वे सामाजिक-आर्थिक सवाल हैं, जो बड़ी आबादी पर असर डालते हैं। दिल्ली और देश के कई दूसरे शहरों में सड़कों पर उतरे युवाओं में इस बात की नाराजगी है कि मौजूदा राजनीति उनसे बेहतर भविष्य का वादा नहीं कर रही।
भाई-भतीजावाद। यह प्रदर्शन उस भाई-भतीजावाद के खिलाफ है, जिसमें देश में मौजूद अच्छे मौके अमीर, राजनीतिक और प्रभावशाली परिवारों के बच्चों को मिल जाते हैं। नाराजगी इस बात को लेकर भी है कि जिन लोगों पर शिक्षा, अर्थव्यवस्था और रोजगार की जिम्मेदारी है, वे अपने बच्चों को विदेश भेज देते हैं। वहां उनका भविष्य तो सुरक्षित हो जाता है, जबकि यहां आम युवाओं के हिस्से आते हैं सांप्रदायिक दंगे व प्रतियोगी परीक्षाओं की कभी न खत्म होने वाली तैयारी।
नौकरियों की कमी।आज शीर्ष पदों पर बैठे लोग किसी बात की जिम्मेदारी नहीं लेते। पहले युवाओं के लिए IT नौकरियां बड़ा सहारा थीं, भले ही उनमें सैलरी कम मिलती थी। अब उनकी जगह AI ले रहा है। वहीं, मैन्युफैक्चरिंग में वेतन बहुत कम है। यहां तक कि ऐपल और सैमसंग की फैक्ट्रियों में काम करने वालों को भी कई बार अमीर परिवारों के घरों में काम करने वालों से कम पैसा मिलता है। नेपो किड्स को छोड़कर पूरी Gen Z पीढ़ी इस सामाजिक-आर्थिक समस्या को झेल रही है। यही असंतोष की सबसे बड़ी वजह है।
समझने में भूल ।सरकार या विपक्ष, कोई भी इस पीढ़ी की परेशानी नहीं समझ पा रहा। वंशवादी राजनीति करने वाले अपनी संपत्ति बढ़ाने में लगे हैं। उन्हें लगता है कि आम लोगों को धर्म और जाति के नाम पर बांटकर व थोड़ी-बहुत आर्थिक सहायता देकर संतुष्ट रखा जा सकता है। उनका रवैया वैसा ही है, जैसे अमीर लोग खैरात बांटते हैं। संपन्न और प्रभावशाली तबका चाहता है कि बस यही व्यवस्था हमेशा चलती रहे।
ताकतवर का साथ।सरकारी संस्थाएं कमजोर हुई हैं और इस ताकतवर वर्ग के लिए ही काम करती हैं। जब लोग विरोध करते हैं, तो लगता है कि न्याय व्यवस्था भी दूसरी ओर झुकी हुई है। फैसले की रफ्तार धीमी पड़ जाती है। आर्थिक उदारीकरण, डॉटकॉम बूम, छोटे शहरों का उभार – इन बदलावों से बूमर्स और मिलेनियल्स की संपत्ति बढ़ी। आज के नेपो किड्स को इसका भी फायदा मिल रहा है।
लड़खड़ाती इकॉनमी।उन्होंने पुराने सेकुलर इंडिया और नई सांप्रदायिक सोच के बीच किसी एक पक्ष को चुना। 2014 में उस लड़ाई में उन्हें जबरदस्त जीत मिली। हालांकि बूमर्स और मिलेनियल्स जब अधेड़ उम्र तक पहुंचे, तो इकॉनमी लड़खड़ा गई। अमीर बनने के सामान्य नुस्खे- ‘म्यूचुअल फंड्स सही है’ और ‘कम्पाउंडिंग की ताकत’ भी काम नहीं आ रहे। हताशा में कई बूमर्स और मिलेनियल्स अपनी हालत के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराने लगे। वे उसी व्यवस्था के बचाव में उतर गए, जिसने उन्हें अमीर तो बनाया, पर आत्मसम्मान छीन लिया।
फिर होगा आंदोलन।इस पीढ़ी ने Gen Z को अपने जैसा बनाना चाहा, लेकिन उससे महत्वाकांक्षा छीन ली। बच्चों को कोटा, NEET, JEE, CLAT वगैरह में भेजा जाने लगा। लेकिन, सरकार ये एग्जाम भी ठीक से नहीं करा सकी। उधर, विदेश जाने के मौके भी घट गए, नौकरियां कम होती गईं, सैलरी घटती गई। इसी माहौल ने Gen Z को एकजुट किया है। इसमें तात्कालिक वजह बना चीफ जस्टिस का कॉकरोच वाला बयान। हो सकता है कि मौजूदा आंदोलन खत्म हो जाए, पर इसकी आर्थिक वजह बनी रहेगी और यह फिर लौटेगा।
(लेखक पीएम की आर्थिक सलाहकार समिति के पूर्व सदस्य हैं)
