नई दिल्ली. मान लीजिए दुनिया के सबसे बड़े तेल सप्लायर आपस में लड़ पड़ें. जहाजों का रास्ता बंद होने लगे. कच्चे तेल की कीमतें हर दिन नई ऊंचाई छूने लगें. कुछ साल पहले तक ऐसी खबर आते ही भारत की चिंता बढ़ जाती थी. पेट्रोल और डीजल महंगे होने का डर रहता था. रुपये पर दबाव बढ़ जाता था और शेयर बाजार भी घबरा जाता था. लेकिन अब तस्वीर काफी बदल चुकी है. दुनिया में तनाव आज भी है. तेल की कीमतों को लेकर अनिश्चितता भी बनी हुई है. फिर भी भारत पहले जितना परेशान नहीं दिखता. वजह यह है कि पिछले कुछ वर्षों में देश ने चुपचाप ऐसी तैयारी कर ली है, जिसने बड़े से बड़े वैश्विक झटकों का असर काफी हद तक कम कर दिया है. यही वजह है कि एक्सपर्ट अब भारत को पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा सुरक्षित मान रहे हैं.
एक टीवी चैनल से बातचीत में सीनियर इकोनॉमिस्ट मिताली निकोरे कहती हैं कि सरकार ने सिर्फ संकट आने का इंतजार नहीं किया. उसने पहले से ही ऐसी रणनीति बनाई, जिससे ईंधन की कीमतों का असर आम लोगों और अर्थव्यवस्था पर कम से कम पड़े. उनके मुताबिक, भारत अब सिर्फ किस्मत के भरोसे नहीं, बल्कि मजबूत तैयारी के दम पर आगे बढ़ रहा है.
एक देश पर निर्भर रहने की आदत छोड़ी
पहले भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कुछ गिने चुने खाड़ी देशों से खरीदता था. लेकिन रूस यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने अपनी रणनीति बदल दी. भारत ने रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदने की रणनीति अपनाई. हाल के महीनों में भारत के कुल कच्चे तेल आयात का करीब 40 से 45 फीसदी हिस्सा अकेले रूस से आया है. इसके अलावा यूएई, इराक, सऊदी अरब, अमेरिका और अफ्रीकी देशों से भी लगातार तेल खरीदा जा रहा है. इसका फायदा यह हुआ कि भारत किसी एक सप्लायर पर निर्भर नहीं रहा.
नए रास्ते भी तैयार कर लिए
पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने पर सबसे ज्यादा चिंता स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों को लेकर होती है. भारत ने इस जोखिम को कम करने के लिए ओमान और यूएई के बंदरगाहों के साथ सहयोग बढ़ाया है. इससे सप्लाई चेन पहले के मुकाबले ज्यादा लचीली हुई है और किसी एक समुद्री रास्ते पर पूरी निर्भरता नहीं रही.
डॉलर पर भी निर्भरता घटाने की कोशिश
जब दुनिया में संकट बढ़ता है तो अमेरिकी डॉलर अक्सर मजबूत हो जाता है. इससे तेल आयात करने वाले देशों की लागत बढ़ जाती है. भारत ने इसका भी विकल्प तलाशना शुरू किया. रूस, यूएई और कुछ अन्य देशों के साथ स्थानीय मुद्रा में व्यापार बढ़ाया गया. इससे हर लेनदेन के लिए डॉलर पर निर्भरता धीरे धीरे कम हो रही है.
देश के अंदर भी तेल का बड़ा भंडार
भारत ने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार भी तैयार किया है. इसे आसान भाषा में समझें तो यह देश के लिए आपातकालीन तेल की तिजोरी है. अगर कुछ समय के लिए वैश्विक सप्लाई बाधित हो जाए तो इसी भंडार से जरूरत पूरी की जा सकती है. इससे अचानक आने वाले संकट का असर कम होता है.
अब सिर्फ तेल नहीं, नई ऊर्जा पर भी जोर
भारत लगातार इलेक्ट्रिक वाहनों, इथेनॉल मिश्रण और सौर ऊर्जा पर निवेश बढ़ा रहा है. पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने से तेल की खपत कम होती है. देश में औसत इथेनॉल ब्लेंडिंग करीब 20 फीसदी तक पहुंच चुकी है. सरकार का मानना है कि इससे कच्चे तेल का आयात कम होगा और हर साल हजारों करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचाने में मदद मिलेगी. वहीं सौर ऊर्जा और दूसरी स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाएं भी तेजी से आगे बढ़ रही हैं. इसका फायदा यह है कि आने वाले वर्षों में आयातित तेल पर निर्भरता धीरे धीरे घट सकती है.
विदेशी मुद्रा भंडार बना बड़ी ताकत
भारत की सबसे बड़ी ताकतों में से एक उसका विदेशी मुद्रा भंडार भी है. भारतीय रिजर्व बैंक के पास जून की शुरुआत में करीब 682 अरब डॉलर (करीब 58 लाख करोड़ रुपये) का विदेशी मुद्रा भंडार था. यह करीब 11 महीने के आयात का खर्च उठाने के लिए पर्याप्त माना जाता है. यही पैसा मुश्किल समय में रुपये को सहारा देता है और जरूरत पड़ने पर देश को तेल समेत जरूरी सामान खरीदने की ताकत देता है.
घरेलू निवेशकों ने भी बढ़ाई मजबूती
कुछ साल पहले विदेशी निवेशक पैसा निकालते थे तो शेयर बाजार में बड़ी गिरावट आ जाती थी. अब तस्वीर बदल चुकी है. आज देश में 1.1 करोड़ से ज्यादा सक्रिय एसआईपी खाते चल रहे हैं और हर महीने म्यूचुअल फंड में 25,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का एसआईपी निवेश आ रहा है. यही वजह है कि विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बावजूद बाजार को घरेलू निवेशकों का मजबूत सहारा मिलता है.
क्या अब भारत पर कोई असर नहीं होगा?
ऐसा बिल्कुल नहीं है कि भारत पर वैश्विक संकट का कोई असर ही नहीं पड़ेगा. अगर तेल की कीमतें बहुत लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं या सप्लाई पूरी तरह बाधित हो जाती है तो असर भारत पर भी होगा. लेकिन फर्क सिर्फ इतना है कि आज भारत के पास पहले के मुकाबले ज्यादा विकल्प हैं. मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार है. तेल खरीदने के कई स्रोत हैं. घरेलू निवेशकों का सहारा है और ऊर्जा के नए विकल्प भी तेजी से बढ़ रहे हैं. यही वजह है कि वैश्विक संकट के दौर में भी भारत पहले की तुलना में कहीं ज्यादा मजबूत स्थिति में नजर आता है.