बिहार सरकारी नौकरी (ETV Bharat)
गया: बिहार के गया जिले के आमस प्रखंड में स्थित बड़की चिल्मी पंचायत में नीमा गांव है. कुछ सालों पहले तक ये गांव भी बुनियादी सुविधाओं से न सिर्फ कोसों दूर था, बल्कि घोर नक्सल प्रभावित भी रहा है, जहां लड़कियों की शिक्षा तो दूर युवकों के लिए भी कलम थामना आसान नहीं था. साल 1988 में पहली बार गांव की एक महिला पुष्पा कुमारी की आंगनबाड़ी में बहाली हुई और यहीं से दूसरी महिलाओं ने भी सफलता की नई इबारत लिखनी शुरू की.
एक महिला ने बदल दी सोच: पुष्पा कुमारी के पुत्र शिक्षक नवनीत कुमार कहते हैं कि तब उनकी मां की नौकरी उस समय गांव और आसपास के क्षेत्रों में चर्चा का विषय बन गया था. क्योंकि तब अधिकतर गांवो के परिवेश में महिलाओं का नौकरी करना समाज की प्रतिष्ठा पर पर सवाल उठाने जैसा होता था. वहीं आज 60 घरों की आबादी वाले इस गांव में 5-10 की संख्या में नहीं बल्कि 30 से अधिक महिलाएं और युवतियां सरकारी नौकरियों में हैं. इनमें बेटियां ही नहीं बहुएं भी शामिल हैं.
गांव की महिलाओं की कहानी (ETV Bharat)
नौकरी की शुरआत का इतिहास: शिक्षक नवनीत कुमार बताते हैं कि उनके दादा ललन प्रसाद 1960 के दशक में गांव के पहले नौकरीपेशा व्यक्ति बने थे. उसके बाद 1980-85 के दौरान एक-दो अन्य पुरुषों को नौकरियां मिलीं. महिलाओं में सबसे पहले 1988 में उनकी मां को नौकरी मिली थी. इसके बाद साल 2015 से गांव में सरकारी नौकरियों का सिलसिला बहुत तेजी से आगे बढ़ा.
“इनमें एक बड़ी वजह गांव में 2014 के बाद हाई स्कूल का होना है. तब हम बेटों के लिए थोड़ा बहुत पढ़ाई को लेकर आसानी थी, लेकिन लड़कियों के लिए आमस जाकर हाई स्कूल की पढ़ाई करना आसान नहीं था. जब हाई स्कूल की स्थापना हुई तो मानों लड़कियों के सपनों को पंख लग गये. हर पिता अपनी बेटी को स्कूल भेजने लगा.”– नवनीत कुमार, शिक्षक
चिल्मी पंचायत में नीमा गांव (ETV Bharat)
संघर्ष और आत्मविश्वास की कहानी: बिहार में पिछले 5 वर्षों में जितनी भी नौकरियां सृजित हुई हैं, उनमें अधिकतर इस गांव की महिलाओं और युवतियों ने अपनी प्रतिभा दिखाई है. हालांकि इस गांव की महिलाओं और बेटियों के लिए आत्मनिर्भर बनना आसान भी नहीं था. पारिवारिक पृष्ठभूमि ऐसी थी कि किसी के पिता मजदूरी से घर चलाते हैं तो किसी के पति खेती किसानी से जुड़े हुए है.
बेटियों से कम नहीं बहुएं: गांव में नौकरी पाने की ललक ,मेहनत संघर्ष संकल्प और समाज के जागरुक होने का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 60 घरों की आबादी वाले गांव में परीक्षाओं की सेल्फ स्टडी के लिए एक नहीं बल्कि 2 लाइब्रेरी स्थापित हैं. इन लाइब्रेरियों में सिर्फ युवक युवतियां ही सेल्फ स्टडी करते हुए नजर नहीं आती हैं बल्कि यहां बड़ी संख्या में गांव की बहुएं भी पढ़ते और तैयारी करते हुए नजर आएंगी.
शादी के 12 साल बाद सविता कुमारी ने पढ़ाई की शुरू (ETV Bharat)
शादी के 12 साल बाद नौकरी की तैयारी: गांव की बुद्धा लाइब्रेरी में एक दर्जन से अधिक महिलाएं और युवतियां परीक्षाओं की जनरल तैयारी कर रही हैं. इनमें एक सविता कुमारी भी हैं. उनकी शादी को 12 साल हो गयी है. लेकिन अब वे भी सरकारी नौकरी की तैयारी कर रही हैं. सविता का मायका गया जिले के बांकेबाजार प्रखंड में है, पति जीविका में नौकरी करते हैं.
‘ननद को देखकर नौकरी में हुई रुचि’: सविता की जब शादी हुई थी तब वह इंटर पास थीं. लेकिन अभी पोस्ट ग्रेजुएट होने के साथ वे बीएड और बिहार स्टेट क्वालीफाई करने के बाद अब बीपीएससी की तैयारी में लगी हैं. सविता के ससुराल में पुरुष ही नहीं बल्कि कई महिलाएं भी सरकारी नौकरी में है. ईटीवी भारत से विशेष बातचीत में सविता खुद कहती हैं कि उन्हें नौकरी करने का तब शौक और जुनून पैदा हुआ जब उनकी एक ननद (पति की बहन) ने सरकारी नौकरी हासिल की थी.
“हम भले ही हंसी मजाक में गांव की बेटियों से कम नहीं होने की तुलना कर लें, लेकिन वास्तविकता यही है कि यहां की बेटियों और सास-ससुर के मार्गदर्शन में ही बहुएं भी सफलता हासिल कर रही हैं. अगर इनका साथ नहीं मिलता तो बहुएं घर चूल्हे तक सीमित हो जाती. इतना नहीं गांवों में जो बहु शादी के समय कम पढ़ी लिखी होती हैं, उन्हें उच्च शिक्षा भी ससुराल वाले दिलवाते हैं. उसका उदाहरण मैं खुद हूं और मुझे विश्वास है कि मैं भी सरकारी नौकरी हासिल कर लूंगी. हालांकि अभी मैं जीविका से जुड़ी भी हुई हूं.”-सविता कुमारी, नीमा गांव निवासी
कई बहु कर रहीं सरकारी नौकरी (ETV Bharat)
गांव की महिलाएं बनीं उदाहरण: गांव की एक शिक्षक बहु कुमारी रंजू कहती हैं कि जब उनकी शादी हुई थी तब गांव में कुछ बेटियां और एक दो बहुएं ही नौकरी में थी. जो भी नौकरी में थीं, वे बाद में उदाहरण बनीं. उन्होंने घर की लड़कियों और बहुओं को आगे बढ़ाने के लिए हर मुमकिन प्रयास किया जिसके नतीजे में आज गांव की महिलाएं भी नौकरी में पुरुषों की तुलना में बराबरी पर हैं, जो सरकारी नौकरी में नहीं हैं वे निजी रूप से आत्मनिर्भर हुई हैं.
शादी के बाद हुई नौकरी: शहर की रहने वाली कुमारी रंजू शादी के समय सिर्फ इंटर पास थीं. वे आत्मनिर्भर बनने के लिए सिलाई-कढ़ाई केंद्र खोलने की तैयारी कर रही थीं. इसी बीच साल 2005 के बाद मुखिया के माध्यम से शिक्षकों की बहाली प्रक्रिया शुरू हुई. उन्होंने परिवार को बताए बिना फॉर्म भरा और उनका चयन हो गया. उनके ससुर भी शिक्षक थे, जिससे उन्हें आगे बढ़ने में आसानी हुई.
“उस समय मेरे सामने सिर्फ एक ही लक्ष्य था कि मैं नौकरी करूं. नौकरी छोटी हो या बड़ी यह हमारे लिए मायने नहीं रखता था. तब बहाली इंटर लेवल से ही हो जाती थी, लेकिन मुझे कुछ बड़ा करना था. इसलिए मैंने पहले ग्रेजुएशन किया फिर एमए किया. b.ed किया, एमए भी किया. जो सरकार के द्वारा हम शिक्षकों के लिए परीक्षा हुई थी, उसको भी पास किया. मैं बुधौल गांव के स्कूल में पदस्थापित हूं.”– कुमारी रंजू, शिक्षिका
पढ़-लिखकर जिंदगी बदल रहीं बेटियां (ETV Bharat)
सरकार की योजनाओं ने दिया उड़ान: नवनीत कुमार का यह भी मानना है कि बिहार में सरकारी योजनाओं ने भी लड़कियों और महिलाओं को शिक्षित बनने के साथ आत्मनिर्भर बनने की राह खोली है. नीतीश कुमार की सरकार में महिलाओं के लिए योजनाओं में आरक्षण ने भी उड़ान दी है. बेटियां खुल कर सामने आईं, जो शुरुआती दौर गुजरा है उस में जिसने भी शिक्षा ग्रहण किया. हमारे गांव में 55 साल की उम्र से लेकर 22 वर्ष की उम्र की महिलाएं और पुरुष नौकरियों में हैं. मेरे गांव का कोई ऐसा घर नहीं है जिसके यहां नौकरी वाला व्यक्ति नहीं है.
बड़े विभागों में गांव की आधी आबादी: अभी कुछ महीने पहले ही गांव की एक बेटी सोनी कुमारी बिहार पुलिस में सिपाही के पद पर बहाल हुई हैं. उनके भी पिता एक छोटे किसान हैं. घर में पहली नौकरी सोनी ने हासिल की है. सोनी से पहले शिक्षा स्वास्थ्य पुलिस जैसे कई बड़े विभागों में गांव की महिलाएं और लड़कियों ने नौकरी पाई हैं.
“गांव में लगभग 5 से अधिक लोग अपनी सरकारी सेवा से सेवानिवृत हो चुके हैं. यहां के पुरुष भी केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकार के विभिन्न विभागों में कर्मचारी से लेकर अधिकारी तक हैं. गांव पिछले 15 सालों में खुशहाल हुआ है. नई पीढ़ियों को अब और बेहतर ढंग से तैयारी कराने का लक्ष्य है ताकि वो बड़े अधिकारी बनें, आईएस आईपीएस बनें.”- नवनीत कुमार, शिक्षक
किन विभागों में कितनी महिलाएं: इनमें लगभग 10 महिलाएं शिक्षा विभाग में कार्यरत हैं, जबकि स्वास्थ्य विभाग में 11 महिलाएं, 4 पुलिस विभाग में हैं. जिनमें एक जूली कुमारी समस्तीपुर एसपी की रीडर भी हैं. यहां की एक महिला अमीन हैं जबकि एक सीए, एक डाक विभाग में है. 4 महिलाएं जीविका में सीएम के पद पर भी हैं, जबकि दर्जनों महिलाएं और बेटियां ऐसी हैं जो बड़े निजी विद्यालय में शिक्षिका और निजी कंपनियों में कार्यरत हैं.
सरकारी नौकरी वाला नीमा गांव (ETV Bharat)
चाची भतीजी एक साथ करती हैं तैयारी: गांव की बेटी स्वीटी कुमारी भी जनरल कंपटीशन की तैयारी कर रही है, लेकिन उनकी तैयारी की खास बात यह है कि ये अपनी चाची सविता कुमारी के साथ हर दिन लाइब्रेरी पहुंचती हैं. उनकी चाची जहां बीपीएससी की तैयारी में लगी हैं, वहीं ये जनरल कंपटीशन की तैयारी में हैं.
गांव के विकास के लिए संगठन: इस गांव में इतनी नौकरियों के पीछे कठिन परिश्रम और दूरदर्शी सोच है. गांव के लोगों के द्वारा अपना एक संगठन डॉ राम मनोहर लोहिया सेवा समिति संचालित है. जिसके माध्यम से गांव के विकास समृद्धि के कार्यों साथ छात्र छात्राओं को प्रशिक्षित कराने, उनकी आर्थिक सहायता की जाती है.
गांव में हर फैसिलिटी: गांव के फिजिकल ट्रेनर रोशन कुमार बताते है की कोई लड़की या लड़का डिफेंस सेक्टर की परीक्षा पास करता है तो उसके फिजिकल टेस्ट की तैयारी गांव में ही कराई जाती है. गांव के युवक युवतियों को वो प्रशिक्षित करते हैं.
“इसके लिए समिति की ओर से उपकरण उपलब्ध कराए गए हैं. मैं सिर्फ गांव की ही नहीं बल्कि पूरे पंचायत के युवक-युवतियों को प्रशिक्षित करता हूं. देखा जाए तो पंचायत में 100 से अधिक पुरुष महिलाओं की नौकरी हो चुकी है.“-रोशन कुमार, ट्रेनर
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ग्रामीणों स्कूल के लिए दी जमीन: गांव के लोगों ने इस सफलता के पीछे कई कुर्बानियां भी दी हैं. उन्होंने न सिर्फ शारीरिक संघर्ष किया बल्कि अपनी जमीनों को भी शिक्षा के लिए दान किया है. पंचायत में जब हाई स्कूल के लिए जमीन तलाश की जा रही थी, तब नीमा गांव के छोटे किसान मनोरंज प्रसाद , सतेंद्र प्रसाद , शिव कुमार प्रसाद, देव कुमार प्रसाद आदि आगे बढ़े और उन्होंने अपनी 2.5 एकड़ जमीन स्कूल स्थापित करने के लिए बिहार सरकार को दी.
2014 में हाई स्कूल हुआ और अब पल्स टू हाई स्कूल हो गया है. इनकी बस यही सोच थी कि गांव में अगर प्लस टू स्कूल स्थापित हो गया तो गांव की बच्चियां अशिक्षित नहीं रहेंगी. उन्हें दूसरे स्थान पर जाकर इंटर तक की पढ़ाई के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा.
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सामुदायिक भवन नहीं सामुदायिक तालाब भी: इस गांव में स्कूल लाइब्रेरी के साथ-साथ गांव की खुशहाली के लिए सामुदायिक तालाब भी है. इस तालाब में हर साल समिति की ओर से मछली पालन किया जाता है. फिर उस मछली से जो आमदनी होती है, वह डॉ राम मनोहर लोहिया समिति में दिया जाता है. जिसके द्वारा गांव में विकास के कार्य होते हैं. इस गांव के लोग अपनी छोटी बड़ी समस्याओं के निदान के लिए सरकारी योजनाओं का इंतजार नहीं करते बल्कि खुद ही अपनी समिति के पैसों से उस समस्या को दूर करते हैं.
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