पटना. पिछले दिनों लोकभवन ने बिहार के सभी विश्वविद्यालयों में पीएचडी करने के नियमों में बड़ा बदलाव करते हुए नया यूनिफॉर्म ऑर्डिनेंस एंड रेगुलेशन 2026 लागू किया था. इसके तहत पीएचडी को लेकर नए दिशा-निर्देश जारी किए गए. इसमें मुख्य रूप से नौकरीपेशा लोगों के लिए पार्ट-टाइम पीएचडी की भी व्यवस्था दी गई है. इसका मतलब यह हुआ कि सरकारी या निजी किसी भी संस्थान में नौकरी करने वाला व्यक्ति बिहार के किसी भी विश्वविद्यालय से पार्ट-टाइम के तौर पर पीएचडी कर सकता है. हालांकि, उसे कुछ शर्तें माननी होंगी. इसमें एक शर्त कॉलेज कैंपस में समय बिताने को लेकर भी है.
अब नौकरी के साथ हायर एजुकेशन पूरा करने का सपना देख रहे लोगों के मन में एक सवाल है कि क्या उन्हें पीएचडी करने के लिए नौकरी छोड़नी होगी? इसका जवाब जानने के लिए लोकल 18 ने पटना यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अखिलेश कुमार सिंह से बातचीत की. उन्होंने बताया कि पार्ट-टाइम पीएचडी करने के लिए किसी भी व्यक्ति को नौकरी छोड़ने की जरूरत नहीं पड़ेगी. बस छुट्टी जरूर लेनी पड़ सकती है.
सबसे पहले समझिए पार्ट-टाइम पीएचडी से जुड़े नियम-कानून
पार्ट-टाइम पीएचडी को लेकर लोकभवन द्वारा जारी दिशा-निर्देशों को आसान भाषा में समझाते हुए डॉ. अखिलेश कुमार ने बताया कि सरकारी नौकरी या किसी निजी कंपनी या इंडस्ट्री में कार्यरत लोग भी अब पार्ट-टाइम पीएचडी कर सकते हैं. इसके लिए उन्हें अपने संस्थान से एनओसी लेना होगा.
उन्होंने बताया कि किसी भी विभाग में अधिकतम चार अभ्यर्थियों को ही पार्ट-टाइम पीएचडी में प्रवेश दिया जाएगा. इनका चयन भी उसी प्रक्रिया से होगा, जो रेगुलर पीएचडी के लिए अपनाई जाती है. यानी अभ्यर्थी को NET क्वालिफाई करना होगा और संबंधित विश्वविद्यालय में इंटरव्यू भी पास करना होगा.
इसके अलावा, पीएचडी की शुरुआत में पहले छह महीने के कोर्सवर्क के दौरान शोधार्थी को विभाग में नियमित रूप से उपस्थित रहना होगा. वहीं, पूरे पीएचडी कार्यकाल के दौरान भी उसे कम से कम 90 दिन विभाग में बिताने होंगे.
नौकरी छोड़नी होगी क्या?
नौकरी छोड़ने के सवाल पर डॉ. अखिलेश कुमार ने स्पष्ट किया कि पार्ट-टाइम पीएचडी करने के लिए किसी भी कर्मचारी को अपनी नौकरी छोड़ने की जरूरत नहीं है. हालांकि, पीएचडी की शुरुआत में छह महीने का कोर्सवर्क विभाग में रहकर पूरा करना अनिवार्य होगा. इसके लिए संबंधित कर्मचारी को अपने संस्थान से छुट्टी लेनी होगी और छुट्टी से संबंधित दस्तावेज विश्वविद्यालय या कॉलेज में जमा करने होंगे.
उन्होंने बताया कि पूरे पीएचडी कार्यकाल के दौरान शोधार्थी को कम से कम 90 दिन विभाग में बिताने होंगे. ये 90 दिन लगातार रहने की बाध्यता नहीं है. अगर पीएचडी की सामान्य अवधि 3 से 6 वर्ष और अधिकतम दो वर्ष के विस्तार को भी जोड़ दिया जाए, तो कुल आठ वर्षों के दौरान किसी भी समय मिलाकर 90 दिन विभाग में उपस्थिति देनी होगी.
डॉ. अखिलेश कुमार ने कहा कि नौकरीपेशा व्यक्ति के लिए तीन-चार साल की छुट्टी लेना संभव नहीं होता, लेकिन छह महीने का अवकाश लेकर कोर्सवर्क पूरा करना आसान है. इसलिए पार्ट-टाइम पीएचडी का यह प्रावधान नौकरी करने वाले लोगों के लिए व्यावहारिक माना जा सकता है.
बिहार में पहली बार ऐसी व्यवस्था
उन्होंने आगे कहा कि अब तक पार्ट-टाइम पीएचडी की व्यवस्था केवल आईआईटी, एनआईटी जैसे तकनीकी संस्थानों और विश्वविद्यालयों में ही उपलब्ध थी. लेकिन अब बिहार के सामान्य विश्वविद्यालयों, जैसे पटना विश्वविद्यालय, मगध विश्वविद्यालय और पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय सहित अन्य राज्य विश्वविद्यालयों में भी यह व्यवस्था लागू कर दी गई है. इससे सरकारी और निजी क्षेत्र में कार्यरत लोग नौकरी जारी रखते हुए भी पीएचडी कर सकेंगे.