‘भाई सरकारी नौकरी में, अलग रहने की वजह से नहीं मिलेगी जॉब’, अनुकंपा नियुक्ति पर पटना हाई कोर्ट का फैसला – patna high court ruling in darbhanga ajit kumar mandal compassionate appointment case petition dismissed


Patna High Court News:पटना हाई कोर्ट के न्यायाधीश कुमार मनीष की एकलपीठ ने दरभंगा निवासी अजीत कुमार मंडल की याचिका खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। उन्होंने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति आर्थिक संकट से परिवार को उबारने के लिए दी जाने वाली सीमित राहत है।

Patna High Court compassionate appointment ruling
पटना हाई कोर्ट का अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति के मामले में अहम फैसला
पटना: पटना हाई कोर्ट ने अनुकंपा के आधार पर नौकरी पाने के नियम को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। पटना हाई कोर्ट (Patna High Court) ने साफ किया है कि अगर मृत सरकारी कर्मचारी के आश्रित परिवार का कोई भी सदस्य पहले से ही सरकारी सेवा में है, तो सिर्फ इस आधार पर परिवार के किसी अन्य सदस्य को अनुकंपा पर नियुक्ति नहीं दी जा सकती कि नौकरी कर रहा भाई या सदस्य अलग रहता है। या परिवार का भरण-पोषण नहीं करता है।

अनुकंपा नियुक्ति उत्तराधिकार का अधिकार नहीं: हाई कोर्ट

मामले की सुनवाई करते हुए पटना हाई कोर्ट जस्टिस कुमार मनीष की एकलपीठ ने दरभंगा निवासी अजीत कुमार मंडल की याचिका को खारिज कर दिया। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा- ‘अनुकंपा पर मिलने वाली नौकरी उत्तराधिकार का अधिकार नहीं है, बल्कि यह केवल कर्मचारी की असमय मृत्यु से उत्पन्न हुए आकस्मिक आर्थिक संकट से परिवार को उबारने के लिए दी जाने वाली एक सीमित राहत है।’

अनुकंपा नियुक्ति का क्या था पूरा मामला?

याचिकाकर्ता अजीत कुमार मंडल के बड़े भाई दरभंगा जिले के किरतपुर प्रखंड कार्यालय में अनुसेवक (चपरासी) के पद पर कार्यरत थे, जिनकी वर्ष 2012 में सेवा के दौरान मृत्यु हो गई थी। इसके बाद अजीत मंडल ने अनुकंपा पर नौकरी के लिए आवेदन किया था। वर्ष 2016 में जिला अनुकंपा नियुक्ति समिति ने उनके आवेदन को यह कहते हुए निरस्त कर दिया था कि परिवार का एक अन्य सदस्य पहले से ही सरकारी नौकरी में है।

जिला अनुकंपा नियुक्ति समिति के फैसले को लेकर अजीत मंडल ने हाई कोर्ट का ‘दरवाजा खटखटाया’। अजीत मंडल ने हाई कोर्ट में अनुकंपा नौकरी के लिए अपील करते हुए अपनी याचिका में दलील दी कि सरकारी सेवा में मौजूद उनका दूसरा भाई अलग रहता है। परिवार को किसी भी तरह की आर्थिक मदद नहीं देता है।

समिति का फैसला कानूनी रूप से सही: हाई कोर्ट

राज्य सरकार की ओर से पेश वकील ने इस दलील का विरोध किया और संबंधित सरकारी प्रावधानों व आदेशों का हवाला दिया। हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद पाया कि याचिकाकर्ता का एक अन्य भाई पहले से सरकारी सेवा में है। साथ ही परिवार के पास अत्यंत दयनीय आर्थिक स्थिति या अचानक आए वित्तीय संकट का कोई ठोस और वैज्ञानिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।

हाई कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि जिला अनुकंपा नियुक्ति समिति की ओर से वर्ष 2016 में लिए गए फैसले में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है, और अजीत मंडल की याचिका को खारिज कर दिया।

सुधेंद्र प्रताप सिंह

लेखक के बारे मेंसुधेंद्र प्रताप सिंहसुधेंद्र प्रताप सिंह नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में प्रिंसिपल डिजिटल कंटेट प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं। वह 2020 में नवभारत टाइम्स की डिजिटल विंग से जुड़े। वर्तमान में राज्य टीम में बिहार-झारखंड और राजस्थान के लिए काम करते हैं। पत्रकारिता की शुरुआत अखबार में रिपोर्टिंग से की। बीते 14 सालों से डिजिटल मीडिया में काम कर रहे हैं। नवभारत टाइम्स में जुड़ने से पहले वह न्यूज18 में सीनियर सब एडिटर की भूमिका में कार्यरत थे।

बिहार की राजनीति, क्राइम, करंट अफेयर्स और ऑफ बीट खबरों पर नजर रखना सुधेंद्र प्रताप की पहली प्राथमिकता रहती है।

विशेषज्ञता- राजनीति, क्राइम, एनलिसिस, सियासी उठा पटक को कवर करना।

पत्रकारिता अनुभव: अखबार और डिजिटल मीडिया में 14 साल से कार्यरत
सुधेंद्र प्रताप सिंह ने साल 2012 में लोकल न्यूज पेपर से पत्रकारिता की शुरुआत की। इसके बाद कल्पतरु एक्सप्रेस अखबार में संपादकीय डेस्क पर काम किया। हिंदुस्तान समाचार पत्र में रिपोर्टिंग की। इसके बाद 2014 में आईबीएन खबर डॉट कॉम से डिजिटल मीडिया में कदम रखा। फिर न्यूज18 हिंदी में सेंट्रल डेस्‍क पर काम किया। वर्तमान में नवभारत टाइम्‍स वेबसाइट के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

सुधेंद्र प्रताप सिंह ने साल 2008 में प्रतिष्ठित डॉ भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा से अंग्रेजी में पोस्‍ट ग्रेजुएशन (MA) किया है।इसके बाद साल 2011 में केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा से पत्रकारिता एवं जनसंचार में पोस्‍ट ग्रेजुएशन डिप्लोमा किया है।

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