बार-बार इस तरह के झटकों ने उनके लिए मुश्किलें बनाई रखीं, क्योंकि शादी के बाद पढ़ाई ज़ारी रखना अपनेआप में एक संघर्ष है.
“आज हम सिर्फ़ इसलिए खड़े हैं, क्योंकि हमने दर्द को देखा और जिया है. मैंने आत्महत्या करने की कोशिश नहीं की. पर यह ज़रूरी नहीं है कि मेरे बच्चे ऐसा नहीं करेंगे, आगे आने वाली पीढ़ी ऐसा नहीं करेगी,” वह पारी को बताती हैं.
संध्या, साधना, अंशु और प्रियंका, फ़रीदाबाद से ऑटो रिक्शा लेकर विरोध प्रदर्शन में शामिल होने पहुंची थीं. प्रदर्शन के दौरान जंतर-मंतर के आसपास सभी सार्वजनिक वाहनों को बंद कर दिया गया था.
इनमें से किसी ने भी इस बारे में अपने परिवार को नहीं बताया था कि प्रोटेस्ट में शामिल होने जा रहीं. वे सभी अपने स्कूल से सीधे यहां पहुंची थीं, जहां वे पढ़ाती हैं. “लड़कियों को ग़लत तरह से उठाया जा रहा है. उन्हें ग्रुप की तरफ़ से बचाया जा रहा है, फिर भी पुलिस उनको घसीट रही है. ये सब देखने के बाद कौन-सी फैमिली आपको यहां आने देगी?,” अंशु कहती हैं. “फैमिली ने आने की परमिशन नहीं दी, क्योंकि उनके लिए हमारी सुरक्षा पहले है. पर हमारा मानना यह है कि पढ़ाई के बिना आप कुछ नहीं कर सकते.”
साधना सबको साथ लेकर आईं. “हमें लगा कि अगर आज हम खड़े नहीं होंगे, तो हमें हमेशा इस बात का अफ़सोस रहेगा कि जिस दर्द को लेकर हम चल रहे हैं, हमने उसके बारे में कभी बोला ही नहीं. कुछ न सही तो फिर भी, हम बस अपने अंदर का ग़ुस्सा बाहर निकालना चाहते हैं,” साधना पारी को बताती हैं.