विशेष :  विज्ञापनों के जरिए बाल यौन शोषण का खेल


प्रमोद भार्गव

इंटरनेट की दुनिया में ठगी और यौन अपराध के अनेक आयाम सामने आ रहे हैं। डिजिटल अरेस्ट के जरिए उच्चशिक्षित व अधिकारियों समेत हर वर्ग के लाखों लोगों को ठगा जा चुका है। अब इस कड़ी में मेटा और इंस्टाग्राम पर शुल्क चुकाकर देखे जानेवाले विज्ञापनों के जरिए बच्चों के यौनशोषण और दुर्व्यवहार से जुड़े वीडियो दिखाने का बड़ा खेल खेला जा रहा है। इस खेल और इंस्टाग्राम के बीच मेटा मध्यस्थ की भूमिका में है। ये वीडियो बहुत कम शुल्क देकर आसानी से मिल जाते हैं। नतीजतन, इस सामग्री का प्रसार करोड़ों लोगों के बीच आसानी से हो रहा है। सवाल उठता है कि अगर इस तरह के वीडियो अत्यंत लोकप्रिय सोशल मीडिया के मंच पर आसानी से खरीदे जा रहे हैं तो इसके पीछे साइबर जंजाल की कौन-सी ताकतें काम कर रही हैं, उन्हें इस तरह के अपराधिक कृत्य को करने की छूट मिली हुई है। क्या इंस्टाग्राम और उसकी संचालक कंपनी मेटा को इसके लिए सीधा जिम्मेदार ठहराया जाना संभव होगा? भारत ही नहीं दुनिया की सरकारों को कंपनियों के इस लालच पर अंकुश लगाना मुश्किल हो रहा है।
भारत सरकार ने बाल यौन शोषण से जुड़ी अश्लील सामग्री बेहिचक प्रसारित करनेवाले इंस्टाग्राम विज्ञापनों के मामले में मेटा को तलब करने का निर्देश दिया है। सरकार मेटा के ही स्वामित्व वाले व्हॉट्सऐप को उसकी नई सुविधा के मामले में नोटिस दे चुकी है। इस सुविधा के तहत उपयोगकर्ता को नाम छिपाकर बात करने की सुविधा हासिल है यानी अरबों की संपत्ति की मालिक इन कंपनियों का लालच येन-केन-प्रकारेण आपत्तिजनक सामग्री से धन बटोरने का बना हुआ है। विडंबना यह है कि ये कंपनियां इतनी ताकतवर हैं कि सामग्री दिखाने का एजेंडा अपनी सुविधा के अनुसार तय करती है और दुनिया की सरकारें इनके आगे लाचार दिखाई देती हैं। इस कारण कंपनियों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के बजाय यह नियम बनाने को लाचार हुई हैं कि १६ साल के कम उम्र के बच्चों को अश्लील सामग्री स्नेप चैट, टिकटॉक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, फेसबुक, व्हॉट्सऐप और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म पर नहीं दिखाई जाए। ऐसे प्रस्तावों के अंतर्गत सोशल मीडिया के उपयोग से पहले दर्शक की उम्र का सत्यापन करना जरूरी होगा। ब्रिटेन इस तरह का प्रस्ताव लागू करने जा रहा है। इसके नियम दिसंबर २०२६ तक बन जाएंगे और मार्च-अप्रैल २०२७ तक इन्हें लागू कर दिया जाएगा। दरअसल ब्रिटेन की रॉयल सोसायटी फॉर पब्लिक हेल्थ द्वारा १४ से २४ वर्ष के युवाओं के बीच किए सर्वे से पता चला कि स्नेपचैट, फेसबुक, ट्यूटर और इंस्टाग्राम से इस आयुवर्ग के युवा में अवसाद, चिंता अपने ही शरीर को लेकर हीनभावना और अकेलापन बढ़ रहा है। यदि तीन घंटे से ज्यादा कोई किशोर सोशल मीडिया पर समय बिताता है तो ऐसे किशोरों पर मानसिक समस्याओं का खतरा दोगुना बढ़ जाता है। यदि प्लेटफॉर्म पर जाने से युवाओं को रोक दिया जाए तो उनके चेहरे पर खुशी, संतुष्टि और उत्साह बढ़ जाता है।
युवाओं पर इन परिणामों को देखते हुए २५ से अधिक देश सोशल मीडिया को प्रतिबंधित करने की पहल कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, इंडोनेशिया और ब्राजील २०२६ के शुरुआत में ही इन प्लेटफॉर्मो को देखने पर प्रतिबंध लगा चुके हैं। वहीं नार्वे, प्रâांस, अमेरिका और चीन जैसे देश सोशल मीडिया से जुड़े नियम कठोर बना चुके हैं। भारत ने मेटा को तलब करने का नोटिस दिया है। इसके जरिए बच्चों के यौनशोषण से जुड़ी सामग्रियों के विज्ञापनों के आरोपों पर स्पष्टीकरण मांगा है। सात दिन के भीतर नोटिस का जवाब देना होगा। केलिफोर्निया में स्थित प्रौद्योगिकी कंपनी मेटा के पास फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हॉट्सऐप जैसे लोकप्रिय एवं सर्वाधिक देखे जाने वाले सोशल मीडिया मंचों का स्वामित्व है।
भारत सरकार ने यह कदम बीबीसी की एक रिपोर्ट आने के बाद उठाया है।
बीबीसी की रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि मेटा एलगो रिदम के जरिए बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री के प्रसारण को बढ़ावा दे रहा है, जिससे सुरक्षा उपायों में गंभीर कमियां उजागार हुई है। अश्लील सामग्री के विज्ञापनों पर रोक संबंधी कठोर नीतियों के बावजूद मेटा के जरिए फेसबुक और इंस्टाग्राम पर अश्लील विज्ञापन लगातार देखे गए है। इन विज्ञापनों पर शुल्क चुकाने के बाद उपयोगकर्ता को टेलीग्राम चैनलों पर ले जाते है, जहां कथित बाल यौनशोषण से जुड़ी सामग्री उपलब्ध रहती है। वैसे भी भारत सरकार ने बच्चों के यौनशोषण से जुड़ी ऑनलाइन सामग्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया हुआ है। सरकार ने समय-समय पर ऐसी बेवसाइट को ब्लॉक भी किया है, जो बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री स्क्रीन पर परोसती है। मेटा को एक नोटिस के जरिए व्हॉट्सऐप पर प्रस्तावित यूजर नेम गोपनीय रखनेवाले फीचर के संबंध में सवाल पूछा है कि ऐसी सुविधा से ऑनलाइन धोखाधड़ी, डिजिटल अरेस्ट घोटाले और यौन अपराध गंभीर रूप धारण कर सकते है, अतएव इस मुद्दे पर सरकार की संतुष्टि नहीं होने तक इस फीचर को प्रतिबंधित रखा जाए। लेकिन विडंबना है कि जो कंपनियां इस तंत्र को संचालित कर रही है, वह ऐसी आधुनिक तकनीकों को सही और मानव समुदायों के लिए उपयोगी ठहराती हैं। इसी के परिणामस्वरूप संसार में डिजिटल अपराधों का दायरा पैâलता जा रहा है। नतीजतन, आपराधिक वारदातों पर रोक लगाना कठिन हो रहा है। कोई भी तकनीक अपने आप में निर्जीव और निपेक्ष होती है। किंतु समस्या तब उत्पन्न होती है। जब इसके नाकारात्मक और गैर-कानूनी उपयोग बढ़ जाते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि ऑनलाइन दुनिया ने मानव समुदायों को विश्वव्यापी बहुस्तरीय सुविधाएं दी हैं और इनकी उपयोगिता भी अत्यंत जरूरी हो गई है, किंतु इसकी ओट में समांतर डिजिटल संसाधनों के माध्यम से ही कंपनियां बेजा धन कमाने की हवस में गैरकानूनी गतिविधियां संचालित करने से बाज नहीं आ रही है। समाज को विकृत करने के ऐसे हथकंड़ों पर वैश्विक कानूनी प्रतिबंधों की आवश्यकता है।
प्रमोद भार्गव

 



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