40 लाख सैलरी पैकेज-फ्लैट और BMW है, पर गरीब फील करता हूं! डॉक्टर ने ऐसे सुलझाई अपने मरीज की उलझन – 40 lakh salary mental poverty modern youth identity crisis edmm


उम्र महज 34 साल, सालाना पैकेज पूरे 40 लाख रुपये, और गुड़गांव की सड़कों पर फर्राटा भरती चमचमाती बीएमडब्ल्यू (BMW) कार. कामयाबी का यह वो मुकाम है, जिसे दूर से देखने वाला कोई भी आम भारतीय युवा ‘सक्सेस’ की आखिरी सीढ़ी मान लेगा. लेकिन जब यही चमकता हुआ कॉरपोरेट प्रोफेशनल एक डॉक्टर के केबिन में बैठकर रुआंसा होकर कहता है, ‘डॉक्टर साहब, मुझे लगता है कि मैं बहुत गरीब हूं और मुझे रात भर नींद नहीं आती…’ तो यह चकाचौंध एक पल में ढह जाती है.

ये किसी काल्पनिक फिल्म की स्क्रिप्ट नहीं है. जाने-माने ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. सनी गर्ग ने हाल ही में अपने एक मरीज की यह दर्दनाक मगर आंखें खोल देने वाली कहानी सोशल मीडिया पर साझा की है. डॉ. सनी कहते हैं कि मैं उसकी बात सुनकर हंसा नहीं, क्योंकि यह सिर्फ एक बंदे की कहानी नहीं है. ये आज के भारतीय मिडिल क्लास प्रोफेशनल की उस ‘मॉडर्न पॉवर्टी’ (आधुनिक गरीबी) का कड़वा सच है, जिसे कॉरपोरेट की चमचमाती दुनिया में कोई खुलकर बयां नहीं करता.

क्या है ‘मॉडर्न पॉवर्टी’ और क्यों 40 लाख का पैकेज भी पड़ गया छोटा?
डॉ गर्ग कहते हैं कि सांख्यिकीय (Statistically) रूप से देखें तो 40 लाख रुपये सालाना कमाने वाला यह युवा भारत के ‘टॉप 1%’ अमीर लोगों की कतार में खड़ा है. लेकिन मानसिक रूप से वह खुद को कंगाली के कगार पर महसूस कर रहा है. डॉ. सनी गर्ग इसके पीछे की मनोवैज्ञानिक वजह बताते हैं:

बदला हुआ रेफरेंस पॉइंट: पहले इस लड़के का मुकाबला गांव के उस पड़ोसी से था जिसका बेटा क्लर्क बन गया था. लेकिन गांव से गुड़गांव आते ही उसका ‘रेफरेंस पॉइंट’ बदल गया. अब उसका मुकाबला लिंक्डइन पर बैठे उस 28 साल के लड़के से है, जो अपना स्टार्टअप 80 करोड़ रुपये में बेचकर ऐश कर रहा है.

बढ़ती इनकम, दस गुना बढ़ती उम्मीदें: जैसे ही हमारी आय बढ़ती है, हमारी अपेक्षाओं का ग्राफ 10 गुना चौड़ा हो जाता है. नतीजा? वह लड़का अपनी 40 लाख की सैलरी से खुश होने की जगह हर संडे की रात को एक भयानक ‘पैनिक अटैक’ से गुजरता है कि ‘मैं पीछे रह गया हूं, अगर 5 साल और ऐसा ही रहा तो मैं लूजर बन जाऊंगा.’

डॉ. सनी गर्ग के वो 3 सवाल, जो आपको खुद से पूछने चाहिए
डॉ. सनी ने इस मरीज की काउंसलिंग के दौरान उससे तीन बुनियादी सवाल पूछे. ये सवाल आज के हर उस युवा के लिए हैं जो करियर की अंधी दौड़ में हांफ रहा है:

सवाल नंबर 1: क्या आपने कभी खुद से कहा कि ‘मैं काफी हूं’?
मरीज का जवाब था- नेवर, डॉ गर्ग कहते हैं कि यह पहली और सबसे बड़ी समस्या है. आप चाहे 4 लाख कमाएं या 40 लाख, अगर आपकी लाइफ में ‘एनफनेस’ (संतोष) की परिभाषा तय नहीं है, तो बैंक अकाउंट के नंबर बदलने से आपकी जिंदगी का खालीपन कभी नहीं बदलेगा.

सवाल नंबर 2: आप यह सब किसके लिए कमा रहे हैं?
मरीज का जवाब था- ‘पता नहीं, बस सब आगे बढ़ रहे हैं तो मैं भी दौड़ रहा हूं.’ 
डॉ गर्ग इस पर कहते हैं कि हमारी आपकी जिंदगी में ‘स्पीड’ (रफ्तार) तो बहुत है, लेकिन ‘डायरेक्शन’ (दिशा) गायब है. जब मंजिल ही तय नहीं होगी, तो सिर्फ अंधाधुंध दौड़ने से सिर्फ और सिर्फ मानसिक थकावट ही हाथ आएगी.

सवाल नंबर 3: क्या आपकी जिंदगी में एक भी चीज ऐसी है जो आप पैसे के लिए नहीं करते?
मरीज ने 30 सेकंड सोचा और कहा कि नहीं, ऐसी कोई चीज नहीं है.इस पर डॉक्टर ने कहा कि ये सबसे खतरनाक मोड़ है. जब आपकी जिंदगी की हर एक्टिविटी का पैमाना सिर्फ और सिर्फ ‘पैसा’ बन जाता है, तो आप एक इंसान से बदलकर एक मशीन बन जाते हैं. और याद रखिए कि मशीन को कभी सुकून की नींद नहीं आती, न ही मशीन को जिंदगी का कोई मकसद मिलता है.

आज जॉब्स, पैकेजेस और एआई के दौर में नौकरियां बचाने की बातें करते हैं, तो डॉ. सनी गर्ग की यह केस स्टडी एक बहुत बड़ा सबक देती है. पैसा कमाइए, खूब कमाइए, बीएमडब्ल्यू भी खरीदिए; लेकिन हर 6 महीने में खुद से ये तीन सवाल जरूर पूछिए. वरना एक दिन आप 60 साल के हो जाएंगे, बैंक का खाता तो फुल होगा, लेकिन जब आप सुबह उठकर आईने में देखेंगे तो खुद अपनी ही पहचान भूल चुके होंगे. ‘मनी प्रॉब्लम’ सॉल्व करना बहुत आसान है दोस्तों, लेकिन ‘आइडेंटिटी प्रॉब्लम’ (पहचान का संकट) इंसान को भीतर से खोखला कर देता है. दुख की बात यह है कि आज का 90% युवा इन दोनों समस्याओं को एक ही समझने की भूल कर बैठा है.

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