Highlights50 हजार रुपये तक जुर्माना लगाने का प्रावधान किया है.फर्जीवाड़े पर रोक लगाना और वास्तविक पात्र लाभार्थियों के अधिकारों की रक्षा करना है. पेशेवर पाठ्यक्रमों और विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के मामले सामने आते रहे हैं.
अकोला: फर्जी दस्तावेजों के आधार पर जाति वैधता प्रमाणपत्र हासिल कर सरकारी नौकरी, शैक्षणिक प्रवेश और आरक्षण का लाभ उठाने वालों पर अब सरकार ने कड़ा शिकंजा कस दिया है. राज्य सरकार ने संबंधित कानून में संशोधन कर ऐसे मामलों में सीधे आपराधिक मामला दर्ज करने और 50 हजार रुपये तक जुर्माना लगाने का प्रावधान किया है.
नए कानून का उद्देश्य आरक्षण व्यवस्था में हो रहे फर्जीवाड़े पर रोक लगाना और वास्तविक पात्र लाभार्थियों के अधिकारों की रक्षा करना है. राज्य में लंबे समय से फर्जी दस्तावेजों के आधार पर जाति वैधता प्रमाणपत्र बनवाकर सरकारी सेवाओं, पेशेवर पाठ्यक्रमों और विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के मामले सामने आते रहे हैं.
इससे पात्र उम्मीदवारों के अधिकार प्रभावित हो रहे थे. अब ऐसे मामलों में सीधे फौजदारी कार्रवाई की जाएगी. संशाेधित कानून के तहत अनुसूचित जनजाति समेत आरक्षित वर्ग के फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर प्रवेश लेने या सरकारी सेवा का लाभ उठाने वालों के खिलाफ अपराध दर्ज किया जाएगा. पहले ऐसे मामलों में दो हजार से 20 हजार रुपये तक जुर्माने का प्रावधान था.
जिसे बढ़ाकर अब 20 हजार से 50 हजार रुपये कर दिया गया है. सरकार ने केवल फर्जी प्रमाणपत्र धारकों पर ही नहीं, बल्कि शिकायत मिलने के बावजूद कार्रवाई में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर भी सख्ती दिखाई है. ऐसे अधिकारियों पर 20 हजार रुपये तक जुर्माना लगाया जा सकेगा और उनके खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जा सकेगी.
यदि किसी परिवार के एक सदस्य के फर्जी जाति वैधता प्रमाणपत्र के आधार पर अन्य सदस्यों को भी प्रमाणपत्र जारी किए गए हैं, तो उन सभी प्रमाणपत्रों की दोबारा जांच होगी. प्रमाणपत्र अवैध पाए जाने पर इसकी सूचना संबंधित शैक्षणिक संस्थान या सरकारी विभाग को देना अनिवार्य होगा.
नए प्रावधान के तहत यदि जाति प्रमाणपत्र जांच समिति किसी आवेदन को खारिज करती है, तो संबंधित व्यक्ति 20 दिनों के भीतर सक्षम प्राधिकरण के समक्ष अपील कर सकेगा. वहां भी राहत नहीं मिलने पर उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का अधिकार सुरक्षित रहेगा.