UNSC: भारत इस वक्त संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अस्थायी सीट के लिए मजबूत दावेदारी पेश कर रहा है। 50 साल पहले भी भारत के सामने एक नाजुक स्थिति आई थी। भारत को उस वक्त अपने कदम पीछे खींचने पड़े थे।

UNSC: जब भारत को पाकिस्तान से मिली थी कूटनीतिक हार
- 1970 के दशक की बात है, जब भारत को UNSC में कूटनीतिक हार का सामना करना पड़ा है। भारत को पाकिस्तानी कूटनीति के सामने हार माननी पड़ी थी। दरअसल, भारत को पाकिस्तान के खिलाफ बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के लिए लड़ाई लड़नी पड़ी। दिसंबर 1971 में पाकिस्तान की शर्मनाक हार हो गई और उसने 93,000 फौज के साथ भारत के सामने आत्समर्पण करना पड़ा था। इसी के बाद भारत दक्षिण एशिया में एक प्रमुख ताकत बन गया था। मगर, ताकतवर भारत के लिए उस वक्त हालात आसान नहीं थे।
- आज भी भारत के सामने करीब-करीब वैसे ही हालात हैं। मगर, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अपनी बड़ी भूमिका के लिए खुद को तैयार कर रहा है।
भारत को रणनीतिक रूप से पीछे हटना पड़ा था।
- हुआ यूं कि 1975 में जब देश में इंदिरा गांधी की ताकतवर सरकार थी, उस वक्त संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1976-77 के कार्यकाल के लिए अस्थायी सदस्यों को चुनने की प्रक्रिया शुरू की। भारत और पाकिस्तान के बीच एशियाई समूह में एक सीट के लिए आमने-सामने मुकाबला हुआ।
- नतीजा यह रहा कि भारत को रणनीतिक रूप से पीछे हटना पड़ा। उस समय पाकिस्तान ने वह सीट हासिल कर ली थी और यह घटना भारत की कूटनीतिक यादों में एक अहम सबक के तौर पर दर्ज है। खासकर जब भारत 2028-29 के लिए UNSC की अस्थायी सदस्यता और उसके साथ मिलने वाली अस्थायी अध्यक्षता के लिए अभियान चला रहा है, तो भारत की उस चूक को भुलाया नहीं जा सकता।
इंदिरा गांधी के नेतृत्व में UNSC के लिए भारत ने पेश की थी दावेदारी
- इंदिरा गांधी की सरकार के नेतृत्व में भारत ‘गुटनिरपेक्ष आंदोलन’ (NAM) में बेहद सक्रिय था। वह विकासशील देशों की आवाज़ उठाने की कोशिश कर रहा था।
- UNSC में अस्थायी सदस्यता के लिए हर दो साल में चुनाव होते हैं। एशिया-पैसिफिक ग्रुप को आमतौर पर दो सीटें मिलती हैं। इनमें से एक सीट अरब या मुस्लिम देशों के बीच और दूसरी अन्य एशियाई देशों के बीच बारी-बारी से आवंटित होती है।
एशियाई सीट के लिए भारत-पाकिस्तान मुख्य दावेदार
- 1975 में मौजूदा सदस्य के तौर पर इराक का कार्यकाल खत्म हो रहा था। 20-23 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) की 30वें सत्र में वोटिंग हुई। अन्य क्षेत्रों (अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, पूर्वी यूरोप) की सीटें पहले ही तय हो चुकी थीं।
- बेनिन, लीबिया, पनामा और रोमानिया आसानी से चुन लिए गए थे। एशियाई सीट के लिए भारत और पाकिस्तान मुख्य दावेदार थे, जबकि फिलीपींस भी दौड़ में था। फिलीपींस ने भी शुरुआत में दावा पेश किया था, लेकिन बाद में अपना नाम वापस ले लिया।
संयुक्त राष्ट्र में आठ राउंड तक चली थी प्रक्रिया
- उस वक्त भारत-पाकिस्तान के बीच आठ राउंड तक चुनाव प्रक्रिया चली थी। UNGA में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत थी। कुल 140 से ज्यादा सदस्यों में से लगभग 93-94 वोट चाहिए था। पहले राउंड में रोमानिया, डाहोमी, पनामा और लीबिया आसानी से चुन लिए गए।
- एशियाई सीट के लिए भारत को 60 वोट मिले, पाकिस्तान को 59 और फिलीपींस को भी कुछ वोट मिले। हालांकि, ये नंबर जीत के लिए काफी नहीं थे। अगले राउंड में भी वोटिंग जारी रही। भारत और पाकिस्तान के बीच वोटों का अंतर लगभग 10-20 था। आठ राउंड की वोटिंग के बाद भी यह प्रक्रिया 23 अक्टूबर तक चलती रही।
कई देशों ने नाम वापस लेने की अपील की
- कई देशों के प्रतिनिधियों ने अपील की थी कि कोई एक देश अपना नाम वापस ले ले, ताकि आम सहमति बन सके। कुवैत के प्रतिनिधि ने खास तौर पर अपील की और भविष्य में समर्थन का भरोसा दिलाया। मिस्र, ईरान, अल्जीरिया, इराक, थाईलैंड, मॉरीशस और अर्जेंटीना जैसे देशों ने भी इस अपील को दोहराया।
- आखिरकार भारत के स्थायी प्रतिनिधि जयपाल ने अपना नाम वापस ले लिया। उन्होंने कहा कि भारत को भविष्य के चुनावों में समर्थन की उम्मीद है। पाकिस्तान के प्रतिनिधि अखुंद ने भारत का शुक्रिया अदा किया और भविष्य में समर्थन का वादा किया। इस तरह, आखिरी राउंड में पाकिस्तान को 123 वोट मिले और वह निर्विरोध चुना गया।
1975 में इस वजह से हार गया भारत
- एशियाई समूह में मुस्लिम और अरब देशों का गुट पाकिस्तान के पक्ष में मजबूती से खड़ा था। 1970 के दशक में OIC (ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन) का प्रभाव बढ़ रहा था। कई अफ़्रीकी-एशियाई देशों ने भी इस्लामिक एकजुटता के नाम पर पाकिस्तान का समर्थन किया।
- एक और बात यह थी कि पाकिस्तान अमेरिका और चीन के करीब था, जबकि भारत सोवियत संघ यानी रूस के साथ था। हालांकि NAM में भारत की स्थिति मजबूत थी। फिर भी कई छोटे देशों ने UNGA की वोटिंग में पाकिस्तान को प्राथमिकता दी।
भारत ने पीछे हटना सबसे अच्छा विकल्प
- भारत ने लंबे समय तक चलने वाले टकराव से बचने के लिए पीछे हटना ही सबसे अच्छा विकल्प समझा। 1975 में भारत आर्थिक चुनौतियों और आंतरिक आपातकाल से जूझ रहा था। वह UNSC सीट के लिए किसी लड़ाई में नहीं पड़ना चाहता था।
- इस पूरी घटना से सबसे बड़ा सबक यह मिला कि सभी देशों की ओर से भविष्य में समर्थन के वादे केवल कूटनीतिक औपचारिकताएँ थीं, जो कभी पूरी नहीं हुईं। यह कदम भारत के लिए एक बड़ा झटका साबित हुआ।
G4 के साथ स्थायी सदस्यता चाहता है भारत
- अब भारत G4 भारत, जर्मनी, जापान और ब्राजील के साथ UNSC की स्थायी सदस्यता चाहता है, लेकिन अस्थायी सीट के लिए भी मजबूत अभियान की जरूरत होती है। 1975 में भारत ने पीछे हटकर अपनी गरिमा बचाई थी, लेकिन आज स्थिति अलग है।
- भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। शांति बनाए रखने में एक प्रमुख भागीदार है और ‘ग्लोबल साउथ’ की एक मजबूत आवाज है। SHANTI जैसी पहलों के जरिए भारत न केवल सीट जीतने बल्कि UNSC में सुधार लाने का नैरेटिव भी तैयार कर रहा है।
- आज संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पाकिस्तान अजरबैजान, तुर्की के साथ-साथ कुछ और मुस्लिम देशों के समर्थन से बाजी मार सकता है।
