UNSC: बांग्लादेश युद्ध के बाद पाकिस्तान ने भारत को दी थी ‘शिकस्त’, नहीं चल पाया था इंदिरा गांधी का दांव – india had stepped back from pakistan in 1975 after bangladesh war during indira gandhi government for non permanent seat in unsc


UNSC: भारत इस वक्त संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अस्थायी सीट के लिए मजबूत दावेदारी पेश कर रहा है। 50 साल पहले भी भारत के सामने एक नाजुक स्थिति आई थी। भारत को उस वक्त अपने कदम पीछे खींचने पड़े थे।

UNSC INDIA
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और भारत
नई दिल्ली: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की अस्थायी सीट की दावेदारी कर रहा भारत एक बार फिर दोराहे पर है। वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अपनी दावेदारी मजबूत करने के लिए हरसंभव कोशिश कर रहा है। विदेश मंत्री एस जयशंकर खुद इस अभियान में लगे हुए हैं। भारत ने 2028-29 के कार्यकाल के लिए UNSC की अस्थायी सीट के लिए अपना चुनावी अभियान आधिकारिक तौर पर शुरू कर दिया है। मगर, दक्षिण एशिया में एक अहम केंद्र बनने के बावजूद भारत एक बार फिर अहम मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है। आज से करीब 50 साल पहले भी भारत के सामने नाजुक स्थिति थी। जानते हैं वो कहानी।

UNSC: जब भारत को पाकिस्तान से मिली थी कूटनीतिक हार

  • 1970 के दशक की बात है, जब भारत को UNSC में कूटनीतिक हार का सामना करना पड़ा है। भारत को पाकिस्तानी कूटनीति के सामने हार माननी पड़ी थी। दरअसल, भारत को पाकिस्तान के खिलाफ बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के लिए लड़ाई लड़नी पड़ी। दिसंबर 1971 में पाकिस्तान की शर्मनाक हार हो गई और उसने 93,000 फौज के साथ भारत के सामने आत्समर्पण करना पड़ा था। इसी के बाद भारत दक्षिण एशिया में एक प्रमुख ताकत बन गया था। मगर, ताकतवर भारत के लिए उस वक्त हालात आसान नहीं थे।
  • आज भी भारत के सामने करीब-करीब वैसे ही हालात हैं। मगर, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अपनी बड़ी भूमिका के लिए खुद को तैयार कर रहा है।

भारत को रणनीतिक रूप से पीछे हटना पड़ा था।

  • हुआ यूं कि 1975 में जब देश में इंदिरा गांधी की ताकतवर सरकार थी, उस वक्त संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1976-77 के कार्यकाल के लिए अस्थायी सदस्यों को चुनने की प्रक्रिया शुरू की। भारत और पाकिस्तान के बीच एशियाई समूह में एक सीट के लिए आमने-सामने मुकाबला हुआ।
  • नतीजा यह रहा कि भारत को रणनीतिक रूप से पीछे हटना पड़ा। उस समय पाकिस्तान ने वह सीट हासिल कर ली थी और यह घटना भारत की कूटनीतिक यादों में एक अहम सबक के तौर पर दर्ज है। खासकर जब भारत 2028-29 के लिए UNSC की अस्थायी सदस्यता और उसके साथ मिलने वाली अस्थायी अध्यक्षता के लिए अभियान चला रहा है, तो भारत की उस चूक को भुलाया नहीं जा सकता।

इंदिरा गांधी के नेतृत्व में UNSC के लिए भारत ने पेश की थी दावेदारी

  • इंदिरा गांधी की सरकार के नेतृत्व में भारत ‘गुटनिरपेक्ष आंदोलन’ (NAM) में बेहद सक्रिय था। वह विकासशील देशों की आवाज़ उठाने की कोशिश कर रहा था।
  • UNSC में अस्थायी सदस्यता के लिए हर दो साल में चुनाव होते हैं। एशिया-पैसिफिक ग्रुप को आमतौर पर दो सीटें मिलती हैं। इनमें से एक सीट अरब या मुस्लिम देशों के बीच और दूसरी अन्य एशियाई देशों के बीच बारी-बारी से आवंटित होती है।

एशियाई सीट के लिए भारत-पाकिस्तान मुख्य दावेदार

  • 1975 में मौजूदा सदस्य के तौर पर इराक का कार्यकाल खत्म हो रहा था। 20-23 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) की 30वें सत्र में वोटिंग हुई। अन्य क्षेत्रों (अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, पूर्वी यूरोप) की सीटें पहले ही तय हो चुकी थीं।
  • बेनिन, लीबिया, पनामा और रोमानिया आसानी से चुन लिए गए थे। एशियाई सीट के लिए भारत और पाकिस्तान मुख्य दावेदार थे, जबकि फिलीपींस भी दौड़ में था। फिलीपींस ने भी शुरुआत में दावा पेश किया था, लेकिन बाद में अपना नाम वापस ले लिया।

संयुक्त राष्ट्र में आठ राउंड तक चली थी प्रक्रिया

  • उस वक्त भारत-पाकिस्तान के बीच आठ राउंड तक चुनाव प्रक्रिया चली थी। UNGA में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत थी। कुल 140 से ज्यादा सदस्यों में से लगभग 93-94 वोट चाहिए था। पहले राउंड में रोमानिया, डाहोमी, पनामा और लीबिया आसानी से चुन लिए गए।
  • एशियाई सीट के लिए भारत को 60 वोट मिले, पाकिस्तान को 59 और फिलीपींस को भी कुछ वोट मिले। हालांकि, ये नंबर जीत के लिए काफी नहीं थे। अगले राउंड में भी वोटिंग जारी रही। भारत और पाकिस्तान के बीच वोटों का अंतर लगभग 10-20 था। आठ राउंड की वोटिंग के बाद भी यह प्रक्रिया 23 अक्टूबर तक चलती रही।

कई देशों ने नाम वापस लेने की अपील की

  • कई देशों के प्रतिनिधियों ने अपील की थी कि कोई एक देश अपना नाम वापस ले ले, ताकि आम सहमति बन सके। कुवैत के प्रतिनिधि ने खास तौर पर अपील की और भविष्य में समर्थन का भरोसा दिलाया। मिस्र, ईरान, अल्जीरिया, इराक, थाईलैंड, मॉरीशस और अर्जेंटीना जैसे देशों ने भी इस अपील को दोहराया।
  • आखिरकार भारत के स्थायी प्रतिनिधि जयपाल ने अपना नाम वापस ले लिया। उन्होंने कहा कि भारत को भविष्य के चुनावों में समर्थन की उम्मीद है। पाकिस्तान के प्रतिनिधि अखुंद ने भारत का शुक्रिया अदा किया और भविष्य में समर्थन का वादा किया। इस तरह, आखिरी राउंड में पाकिस्तान को 123 वोट मिले और वह निर्विरोध चुना गया।

1975 में इस वजह से हार गया भारत

  • एशियाई समूह में मुस्लिम और अरब देशों का गुट पाकिस्तान के पक्ष में मजबूती से खड़ा था। 1970 के दशक में OIC (ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन) का प्रभाव बढ़ रहा था। कई अफ़्रीकी-एशियाई देशों ने भी इस्लामिक एकजुटता के नाम पर पाकिस्तान का समर्थन किया।
  • एक और बात यह थी कि पाकिस्तान अमेरिका और चीन के करीब था, जबकि भारत सोवियत संघ यानी रूस के साथ था। हालांकि NAM में भारत की स्थिति मजबूत थी। फिर भी कई छोटे देशों ने UNGA की वोटिंग में पाकिस्तान को प्राथमिकता दी।

भारत ने पीछे हटना सबसे अच्छा विकल्प

  • भारत ने लंबे समय तक चलने वाले टकराव से बचने के लिए पीछे हटना ही सबसे अच्छा विकल्प समझा। 1975 में भारत आर्थिक चुनौतियों और आंतरिक आपातकाल से जूझ रहा था। वह UNSC सीट के लिए किसी लड़ाई में नहीं पड़ना चाहता था।
  • इस पूरी घटना से सबसे बड़ा सबक यह मिला कि सभी देशों की ओर से भविष्य में समर्थन के वादे केवल कूटनीतिक औपचारिकताएँ थीं, जो कभी पूरी नहीं हुईं। यह कदम भारत के लिए एक बड़ा झटका साबित हुआ।

G4 के साथ स्थायी सदस्यता चाहता है भारत

  • अब भारत G4 भारत, जर्मनी, जापान और ब्राजील के साथ UNSC की स्थायी सदस्यता चाहता है, लेकिन अस्थायी सीट के लिए भी मजबूत अभियान की जरूरत होती है। 1975 में भारत ने पीछे हटकर अपनी गरिमा बचाई थी, लेकिन आज स्थिति अलग है।
  • भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। शांति बनाए रखने में एक प्रमुख भागीदार है और ‘ग्लोबल साउथ’ की एक मजबूत आवाज है। SHANTI जैसी पहलों के जरिए भारत न केवल सीट जीतने बल्कि UNSC में सुधार लाने का नैरेटिव भी तैयार कर रहा है।
  • आज संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पाकिस्तान अजरबैजान, तुर्की के साथ-साथ कुछ और मुस्लिम देशों के समर्थन से बाजी मार सकता है।

दिनेश मिश्र

लेखक के बारे मेंदिनेश मिश्रदिनेश मिश्र, नवभारत टाइम्स (डिजिटल) में असिस्टेंट एडिटर और एक्सप्लेनर एक्सपर्ट हैं। वे अप्रैल-2024 में टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के नवभारत टाइम्स, डिजिटल विंग से जुड़े। दिनेश मिश्र NBT डिजिटल में एक्सप्लेनर और स्पेशल स्टोरीज की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। ये एक्सप्लेनर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय, बिजनेस और एंटरटेनमेंट समेत किसी भी कैटेगरी की खबरों से जुडे होते हैं, जिसमें दिनेश मिश्र रणनीतिक रूप से डीप डाइव, रिसर्च, वैल्यु एड, एक्सपर्ट कमेंट्स जैसी जरूरी बातें शामिल होती हैं। इन एक्सप्लेनर को लेकर वीडियो भी करते हैं। साथ ही NBT डिजिटल के स्थायी कॉलम मंडे मोटिवेशन, ट्यूजडे ट्रीविया और वेडनेसडे बिग टिकट के लिए डीप डाइव रोचक स्टोरी भी लिखते हैं। वह हर एक्सप्लेनर स्टोरी में सटीक संपादन के साथ-साथ रियल टाइम का ध्यान रखते हैं। इसके अलावा, वे गूगल ट्रेंड से जुड़ी स्टोरीज भी करते आए हैं, जो अहम टास्क है।

दिनेश मिश्र ने प्रयागराज महाकुंभ की ग्राउंड कवरेज की है। साथ ही 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान खबरों को डेस्क और ग्राउंड दोनों से कवर किया है। 2025 के लोकसभा चुनाव के साथ-साथ स्टेट असेंबली इलेक्शंस (हालिया महाराष्ट्र और बिहार चुनाव) के दौरान भी डेस्क से ओपिनियन पीस लिखने के साथ-साथ रियल टाइम एक्सप्लेनर भी किए। इसके अलावा, सोशल मीडिया पर फर्जी खबरों के खिलाफ एनबीटी फैक्ट चेक भी करते रहे हैं।

दिनेश मिश्र अपने करीब 16 साल के कॅरियर के दौरान प्रिंट मीडिया और डिजिटल मीडिया में डेस्क, ग्राउंड रिपोर्टिंग और इंटरव्यू करने के साथ अलग-अलग भूमिकाओं में काम करते आए हैं। हिंदी और गीत-संगीत में दखल रखने वाले दिनेश मिश्र ने कई किताबों की समीक्षा भी की। दिनेश मिश्र ने जाने-माने गीतकार गुलजार और गोपालदास नीरज का इंटरव्यू किया, हिंदी के महान कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के अनुभवों को लेकर ग्राउंड रिपोर्टिंग भी की। दिनेश मिश्र ने शोले के निर्माता-निर्देशक रमेश सिप्पी का इंटरव्यू भी किया। वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर का इमरजेंसी के अनुभव पर इंटरव्यू किए और 1996 से लेकर 2001 तक अमेरिका में भारत के राजदूत रहे नरेश चंद्रा का भी इंटरव्यू किया है। इसके अलावा, हिंदी के बड़े लेखक गिरिराज किशोर और विश्वनाथ त्रिपाठी का इंटरव्यू भी किए।

नेशनल-इंटरनेशनल, बिजनेस और एंटरटेनमेंट की खबरों को लेकर मीडिया और सोशल मीडिया पर नजर रहती है। पहली प्राथमिकता है किसी भी खबर की सच्चाई के साथ विश्लेषण करना। इसके बाद उसका असर कहां और कितना पड़ेगा, इसे लेकर भी अवेयर रहते हैं।

पत्रकारिता का अनुभव
दिनेश मिश्र का पत्रकारिता का कॅरियर हिंदी के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय अखबार दैनिक जागरण, नोएडा के सेंट्रल डेस्क के साथ साल 2010 में शुरू हुआ। इसके बाद से यह सफर 2013 में अमर उजाला, नोएडा से होता हुआ 2016 में राजस्थान पत्रिका के नेशनल इंटीग्रेटेड कंटेंट स्टेशन, नोएडा तक पहुंचा, जहां अखबार के साथ-साथ डिजिटल, टीवी और तीनों ही प्लेटफॉर्म पर एकसाथ काम किए। इसके बाद दिनेश मिश्र ने फिर 2019 में अमर उजाला में लौटे, जहां से 2021 में दैनिक भास्कर के डीबी डिजिटल में काम किया और एक्सप्लेनर और डीप डाइव-रिसर्च और स्पेशल स्टोरीज की बारीकियां सीखीं। इसके बाद अप्रैल, 2024 में दिनेश मिश्र देश के प्रतिष्ठित मीडिया समूह टाइम्स ऑफ इंडिया के नवभारत टाइम्स से जुड़े।

दिनेश मिश्र ने कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी, हरियाणा से पत्रकारिता से एमए किया। उससे पहले महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया। उससे भी पहले वो समाज शास्त्र से भी एमए कर चुके हैं। दिनेश मिश्र ने संघ लोक सेवा आयोग की प्रतिष्ठित सिविल सेवा की मुख्य परीक्षा भी दी है और उत्तर प्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन की कई परीक्षाएं भी दीं। इसके अलावा, मिनिस्ट्री ऑफ सोशल जस्टिस एंड एमपावरमेंट के एक रिसर्च प्रोग्राम 6 महीने का सर्टिफिकेट कोर्स इन जेरियाट्रिक केयर भी किया है।… और पढ़ें