Crude Oil Crash: $120 से $70 पर आया कच्चा तेल, भारत में सस्ता होगा पेट्रोल-डीजल?
कुछ ही हफ्ते पहले पूरी दुनिया को डर था कि कच्चा तेल 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को लेकर अनिश्चितता ने वैश्विक तेल बाजार में घबराहट पैदा कर दी थी। लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है।

जो कच्चा तेल 120 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया था, वह अब करीब 70 डॉलर के आसपास कारोबार कर रहा है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इतनी बड़ी गिरावट क्यों आई और क्या इसका फायदा भारत के आम लोगों को भी मिलेगा?
तेल की कीमतों में उछाल की सबसे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव था। बाजार को डर था कि अगर हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद हो गया तो दुनिया की तेल सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हो जाएगी।
हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे अहम तेल व्यापार मार्ग माना जाता है। वैश्विक कच्चे तेल की लगभग 20% सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है। ऐसे में किसी भी तरह की रुकावट से तेल की कीमतों में तेज उछाल आना स्वाभाविक था।
इसी डर की वजह से निवेशकों ने बड़ी मात्रा में खरीदारी की और कीमतें तेजी से ऊपर चली गईं।
अब हालात पहले से काफी बदल चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड करीब 70 डॉलर प्रति बैरल, WTI लगभग 67 डॉलर और मर्बन क्रूड करीब 65 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है।
इसके पीछे कई अहम कारण हैं:
1. अमेरिका और ईरान के बीच तनाव में कमी
हाल के दिनों में दोनों देशों के बीच बातचीत आगे बढ़ने के संकेत मिले हैं। इससे बाजार को भरोसा हुआ है कि मिडिल ईस्ट में हालात पहले से बेहतर हो सकते हैं।
जैसे ही युद्ध का खतरा कम हुआ, तेल बाजार में बना ‘रिस्क प्रीमियम’ भी घटने लगा और कीमतों पर दबाव आया।
2. भविष्य की सप्लाई को लेकर बढ़ा भरोसा
तेल बाजार केवल वर्तमान स्थिति नहीं देखता बल्कि आने वाले समय की संभावनाओं के आधार पर भी कीमतें तय करता है।
जब निवेशकों को यह भरोसा होने लगा कि आने वाले महीनों में सप्लाई सामान्य बनी रहेगी, तो उन्होंने पहले से ही खरीदारी कम कर दी। इसी वजह से कीमतों में तेजी से गिरावट देखने को मिली।
3. OPEC+ उत्पादन बढ़ाने की तैयारी में
तेल उत्पादक देशों के समूह OPEC+ ने उत्पादन बढ़ाने के संकेत दिए हैं।
जब बाजार में सप्लाई बढ़ने की उम्मीद होती है और मांग में कोई बड़ी बढ़ोतरी नहीं होती, तो कीमतों पर दबाव बनना तय होता है। यही वजह भी कच्चे तेल को नीचे खींच रही है।
4. Strategic Oil Reserve ने घटाई घबराहट
पिछले तेल संकट के दौरान कई देशों ने अपने स्ट्रेटेजिक ऑयल रिजर्व भर लिए थे।
इसका मतलब यह है कि अगर कुछ समय के लिए सप्लाई प्रभावित भी होती है, तब भी उनके पास पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। इसी कारण बाजार में पहले जैसी घबराहट देखने को नहीं मिल रही।
साथ ही सऊदी अरब, UAE और अन्य प्रमुख उत्पादक देशों से भी अधिक उत्पादन की उम्मीद जताई जा रही है।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयात करने वाला देश है। देश अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है।
ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता होने से भारत का आयात बिल कम हो सकता है। इसके अलावा-
- चालू खाते के घाटे पर दबाव कम हो सकता है।
- रुपये को मजबूती मिल सकती है।
- महंगाई नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है।
- सरकार पर सब्सिडी और आयात लागत का बोझ घट सकता है।
इस सवाल का जवाब इतना आसान नहीं है।
भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें केवल कच्चे तेल की कीमतों से तय नहीं होतीं। इनमें एक्साइज ड्यूटी, VAT, रिफाइनिंग लागत, ट्रांसपोर्टेशन और मार्केटिंग मार्जिन जैसे कई अन्य खर्च भी शामिल होते हैं।
इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता होने का असर घरेलू ईंधन कीमतों पर कुछ समय बाद और सीमित रूप में दिखाई दे सकता है।
आने वाले समय में तेल बाजार की दिशा तीन बड़े फैक्टर तय करेंगे-
- मिडिल ईस्ट में तनाव कितना कम रहता है।
- हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पूरी तरह सामान्य कब होता है।
- OPEC+ उत्पादन में कितनी बढ़ोतरी करता है।
अगर ये तीनों कारक सकारात्मक बने रहते हैं, तो कच्चे तेल की कीमतों में आगे भी नरमी देखने को मिल सकती है। इसका सबसे बड़ा फायदा भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों को मिलने की संभावना रहेगी।