राज्य ब्यूरो, भोपाल। मध्य प्रदेश में साइबर ठग अब ठगी गई रकम को बचाने के लिए कई स्तरों (लेयर) वाले बैंक खातों का जाल बिछा रहे हैं। ग्वालियर में चार्टर्ड अकाउंटेंट से हुई 21 करोड़ रुपये की साइबर ठगी में आरोपितों ने रकम को 12 लेयर के हजारों खातों में ट्रांसफर कर दिया। यही वजह है कि अब तक केवल 2.05 करोड़ रुपये, यानी करीब 10 प्रतिशत राशि ही होल्ड कराई जा सकी है।
साइबर अधिकारियों के अनुसार प्रदेश में एक मामले में ठगी की रकम को अधिकतम 77 लेयर तक के खातों में भेजे जाने का रिकॉर्ड सामने आया है। इससे संकेत मिलता है कि साइबर गिरोहों के पास किराये के बैंक खातों (म्यूल अकाउंट) का बड़ा नेटवर्क सक्रिय है।
प्रदेश में 3.3 लाख म्यूल खाते चिह्नित
साइबर पुलिस मुख्यालय की जांच में अब तक 3.3 लाख म्यूल खातों की पहचान की जा चुकी है। ये खाते 2.83 लाख साइबर धोखाधड़ी की शिकायतों की जांच के दौरान सामने आए। इन खातों के खिलाफ चलाए गए ‘ऑपरेशन मैट्रिक्स’ के तहत 12 जिलों में 26 एफआईआर दर्ज की गईं और 46 आरोपितों को गिरफ्तार किया गया।
अब पुलिस ‘ऑपरेशन मैट्रिक्स 2.0’ शुरू करने जा रही है। इस चरण में पहली लेयर के बाद दूसरी लेयर के खातों की गहन जांच होगी। पुलिस यह पता लगाएगी कि खाते किसके नाम पर हैं, उनमें कितनी राशि आई और आगे किस खाते में भेजी गई। इसके आधार पर संबंधित खाताधारकों से पूछताछ की जाएगी।
ऐसे काम करता है लेयर वाला साइबर फ्रॉड
साइबर विशेषज्ञों के मुताबिक, ठगी की रकम जितनी बड़ी होती है, उसे उतनी ही अधिक लेयर वाले खातों में बांटा जाता है। छोटी-छोटी रकम अलग-अलग खातों में भेजे जाने से बैंकों के लिए संदिग्ध लेनदेन की पहचान करना मुश्किल हो जाता है।
जिस खाते में सबसे पहले ठगी की राशि पहुंचती है, उसे पहली लेयर माना जाता है। वहां से रकम दूसरे खातों में भेजी जाती है, जो दूसरी लेयर बनाते हैं। इसके बाद यही प्रक्रिया लगातार आगे बढ़ती रहती है और हर नई लेयर में खातों की संख्या भी बढ़ती जाती है।
पुलिस की जांच में म्यूल खातों की खरीद-फरोख्त करने वाले तीन अंतरराज्यीय और एक अंतरराष्ट्रीय गिरोह का भी पता चला है। देवास सहित कई जिलों में ऐसे नेटवर्क सामने आए हैं, जहां खाताधारकों को खाते में आने वाली रकम के आधार पर कमीशन दिया जाता था। रीवा, सतना और पन्ना जिलों में ऐसे म्यूल खातों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक पाई गई है।