भारत की ढाल, तुर्की का बवाल! S-400 बेचने निकले एर्दोगन, पुतिन के हाथ में चाबी
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Russia S-400 News: तुर्की रूस से खरीदे गए S-400 एयर डिफेंस सिस्टम को पश्चिम एशिया के किसी देश को बेचने पर विचार कर रहा है. ऐसा इसलिए ताकि अमेरिका की नाराजगी खत्म हो और उसे फिर से F-35 कार्यक्रम में जगह मिल सके. लेकिन यह सौदा जितना आसान दिखता है, उतना है नहीं. आइए समझें कि इसमें क्या दिक्कते हैं.
तुर्की S-400 को बेचना चाहता है,
Russia S-400 News: रूस से खरीदे गए S-400 एयर डिफेंस सिस्टम ने तुर्की को जितना फायदा नहीं दिया, उससे कहीं ज्यादा सिरदर्द दे दिया. रिपोर्ट है कि राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन S-400 से छुटकारा पाना चाहते हैं ताकि अमेरिका के साथ रिश्ते सामान्य हों और तुर्की की F-35 स्टील्थ फाइटर प्रोग्राम में वापसी का रास्ता खुल सके. लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या तुर्की चाहे तो S-400 किसी को भी बेच सकता है? जवाब है- नहीं. क्योंकि इस पूरे सौदे की आखिरी चाबी अभी भी रूस के हाथ में है. आइए समझें कि भारत की रक्षा करने वाला S-400 कैसे तुर्की की मुसीबत बन गया और कैसे ये अभी भी इसका सिरदर्द है. वहीं खाड़ी देशों के पास जाना अमेरिका के लिए चिंता की बात क्यों होगी. आखिर तुर्की के पास क्या ऑप्शन हैं और क्या भारत उसे बचा सकता है.
क्या है ताजा मामला?
तुर्की के अखबार हुर्रियत ने दावा किया है कि अंकारा S-400 सिस्टम को किसी खाड़ी देश को ट्रांसफर करने की तैयारी कर रहा है. संभावित खरीदारों में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और कतर का नाम सबसे आगे है. वहीं रूस ने भी पुष्टि कर दी कि इस मुद्दे पर रूस और तुर्की के बीच बातचीत चल रही है. हालांकि रूसी राष्ट्रपति कार्यालय के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने इसे ‘बेहद संवेदनशील मामला’ बताते हुए ज्यादा जानकारी देने से इनकार कर दिया. यानी पहली बार रूस ने सार्वजनिक तौर पर माना है कि S-400 के भविष्य पर दोनों देशों के बीच संपर्क बना हुआ है.
तुर्की अपने पास S-400 क्यों नहीं रखना चाहता?
असल वजह अमेरिका है. तुर्की ने साल 2017 में रूस से S-400 खरीदा था. इसके बाद अमेरिका ने सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए उसे F-35 कार्यक्रम से बाहर कर दिया और CAATSA के तहत प्रतिबंध भी लगाए. अब डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल में संकेत दिया है कि अगर तुर्की S-400 से छुटकारा पा लेता है तो उसके लिए F-35 का दरवाजा फिर खुल सकता है. तुर्की के लिए यह सिर्फ लड़ाकू विमान खरीदने का मामला नहीं है. F-35 कार्यक्रम में लौटने का मतलब अरबों डॉलर का रक्षा उद्योग, तकनीक और भविष्य के सैन्य कारोबार से दोबारा जुड़ना भी है. यही कारण है कि तुर्की इससे पीछा छुड़ाना चाह रहा है. समस्या ये है कि वह अपनी मनमर्जी से ऐसा नहीं कर सकता.
क्या तुर्की सीधे किसी और देश को बेच सकता है?
यहीं सबसे बड़ा कानूनी पेच है. 2017 के रूस-तुर्की समझौते के मुताबिक S-400 को किसी तीसरे देश को ट्रांसफर करने के लिए मॉस्को की औपचारिक मंजूरी जरूरी है. यानी एर्दोगन चाहकर भी अकेले फैसला नहीं ले सकते. अगर ऐसा होता तो एर्दोगन अपने यार पाकिस्तान को भी दे सकते थे. रूस चाहे तो मंजूरी दे सकता है, रोक सकता है या खुद सिस्टम वापस खरीदने का प्रस्ताव भी रख सकता है.
क्या रूस मंजूरी देगा?
इसका जवाब अभी साफ नहीं है. रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण पुतिन अपनी एयर डिफेंस क्षमता मजबूत करना चाहते हैं. ऐसे में वह S-400 वापस अपने पास रखना चाहेंगे. दूसरी तरफ मॉस्को तुर्की पर अपना रणनीतिक दबाव भी बनाए रखना चाहता है. अगर वह मंजूरी देने में देरी करता है तो अंकारा के लिए अमेरिका के साथ समझौता भी अटक सकता है. यानी इस पूरे खेल में आखिरी वीटो रूस के पास है.
खरीदार कौन हो सकता है?
फिलहाल सबसे ज्यादा चर्चा UAE और कतर की है. ईरान और अमेरिका के हालिया सैन्य टकराव के बाद खाड़ी देशों ने अपनी एयर डिफेंस मजबूत करने की कोशिशें तेज कर दी हैं. ऐसे में S-400 उनके लिए अच्छा विकल्प बन सकता है. हालांकि किसी भी देश के नाम की आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है. लेकिन इससे अमेरिका की नई परेशानी शुरू हो सकती है. यहीं कहानी दिलचस्प हो जाती है.
तुर्की से S-400 हटाने से अमेरिका की एक समस्या खत्म होगी, लेकिन अगर वही सिस्टम कतर या UAE पहुंच गया तो वह अमेरिकी सैन्य ठिकानों के और ज्यादा करीब आ जाएगा. कतर में अमेरिका का अल-उदैद एयर बेस है, जबकि UAE में भी अमेरिकी सैन्य मौजूदगी मजबूत है. यानी जिस रूसी रडार सिस्टम को अमेरिका तुर्की में F-35 के लिए खतरा बता रहा था, वही सिस्टम उसके अपने बड़े सैन्य अड्डों के आसपास पहुंच सकता है.
क्या इससे रूस को भी चिंता होगी?
कुछ हद तक हां. अगर S-400 अमेरिकी बेस के पास सक्रिय रहता है तो वह अमेरिकी विमानों का डेटा जुटा सकता है. लेकिन दूसरी तरफ अमेरिका भी उसी सिस्टम के रडार, उसकी फ्रीक्वेंसी, ट्रैकिंग क्षमता और कमजोरियों का अध्ययन कर सकता है. हालांकि रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि रूस पहले ही S-400 भारत, चीन और तुर्की जैसे देशों को बेच चुका है. इसलिए निर्यात मॉडल में सबसे संवेदनशील तकनीक पहले से सीमित होती है. इसके अलावा यूक्रेन युद्ध के दौरान पश्चिमी देशों को S-400 की क्षमताओं और कमजोरियों पर काफी जानकारी पहले ही मिल चुकी है.
क्या भारत खरीदार बन सकता है?
पहले कुछ विश्लेषणों में भारत को संभावित खरीदार माना गया था क्योंकि भारतीय वायुसेना पहले से S-400 चला रही है और उसके पास इसका ऑपरेशनल अनुभव भी है. लेकिन अभी भारत और तुर्की के रिश्ते काफी ठंडे हैं. पाकिस्तान को लेकर दोनों देशों के मतभेद और हालिया तनाव ऐसे किसी सौदे की संभावना को फिलहाल नहीं दिखती है.
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Yogendra Mishra holds a degree in Journalism from the University of Allahabad. He has been actively associated with the media industry since 2017 and brings extensive experience across various domains of journa…और पढ़ें