नई दिल्ली (Single Woman Govt Job Transfer Policy). सरकारी नौकरी की नीतियां पढ़ने में बेहद संवेदनशील लगती हैं. महिलाओं के मामले में नियम-कायदे काफी उदार नजर आते हैं. नीतियों में कहा जाता है कि विधवा, तलाकशुदा या अविवाहित महिला कर्मचारियों को उनके गृह जनपद या पसंदीदा जगह पर पोस्टिंग मिलनी चाहिए. मकसद बहुत साफ है कि बिना किसी फैमिली सपोर्ट के संघर्ष कर रही इन महिलाओं को सोशल सिक्योरिटी मिल सके और वे काम के साथ-साथ अपनी जिंदगी को भी संभाल सकें.
शानदार लगते हैं कागजों पर लिखे नियम
सरकारी नौकरी की नीति के मुताबिक, अगर कोई महिला सिंगल पेरेंट है, विधवा है या उसका तलाक हो चुका है तो उसे ट्रांसफर के मामलों में सबसे पहली प्राथमिकता मिलनी चाहिए. लेकिन असल जिंदगी में जैसे ही कोई अकेली महिला इस नीति के तहत ट्रांसफर की अर्जी लगाती है, सरकारी बाबुओं और अधिकारियों का रवैया अजीब हो जाता है. उनसे ऐसे सवाल पूछे जाते हैं और इस तरह के दस्तावेज मांगे जाते हैं कि वे खुद को अपराधी महसूस करने लगती हैं. ट्रांसफर फाइल को एक टेबल से दूसरी टेबल तक खिसकने में महीनों लग जाते हैं. कई बार तो अधिकारियों की उदासीनता के कारण पूरी ट्रांसफर लिस्ट आ जाती है, लेकिन इन जरूरतमंद महिलाओं का नाम उसमें से नदारद रहता है.
सिफारिश और जुगाड़ का चलता है सबसे बड़ा खेल
ऑफिस के अंदर की सबसे बड़ी हकीकत यह है कि आज भी ट्रांसफर और पोस्टिंग के पीछे ‘जुगाड़ और पैरवी’ का सबसे बड़ा खेल चलता है. जिस महिला कर्मचारी के पीछे कोई मजबूत राजनीतिक या प्रशासनिक ‘गॉडफादर’ होता है, उसका ट्रांसफर बिना किसी नीति के भी मिनटों में मनचाही जगह पर हो जाता है. वहीं, बिना किसी सहारे के अपनी ड्यूटी कर रही अकेली महिलाएं केवल नीतियों का हवाला देती रह जाती हैं. अधिकारियों की नजर में उनकी मजबूरी और अकेलेपन की कोई वैल्यू नहीं होती. अगर पैरवी नहीं है तो ट्रांसफर की फाइल पर ‘प्रशासनिक आवश्यकताओं’ का बहाना बनाकर लाल स्याही फेर दी जाती है.
मानसिक प्रताड़ना और पक्षपात का दोहरा दर्द
तलाकशुदा या सिंगल महिला कर्मचारियों को ऑफिस में अक्सर अलग नजरिए से देखा जाता है. ट्रांसफर के लिए बड़े अधिकारियों के केबिन के चक्कर काटते वक्त उन्हें न केवल प्रशासनिक अड़चनों का सामना करना पड़ता है, बल्कि कई बार मानसिक प्रताड़ना और व्यक्तिगत टिप्पणियों का शिकार भी होती हैं. उनसे पूछा जाता है- अकेले ही तो रहना है, कहीं भी रह लो, क्या फर्क पड़ता है? या फिर- आपके बच्चे तो बड़े हो गए होंगे, अब ट्रांसफर की क्या जरूरत है? इस तरह का असंवेदनशील बर्ताव उनका मनोबल तोड़ देता है.
इसका समाधान क्या है?
दरअसल, नीतियों को सिर्फ बना देना काफी नहीं होता, बल्कि सख्ती से उनकी मॉनिटरिंग होना भी बेहद जरूरी है.
- ऑनलाइन और ट्रांसपेरेंट सिस्टम: ट्रांसफर की पूरी प्रक्रिया को ऑनलाइन किया जाए, जहां हर कैटेगरी (जैसे विधवा, तलाकशुदा) के लिए सीटें और प्राथमिकताएं पहले से तय हों.
- फाइल ट्रैकिंग और समय सीमा: अगर किसी अकेली महिला ने ट्रांसफर की अर्जी दी है तो अधिकारियों को एक निश्चित समय सीमा के अंदर उस पर फैसला लेना अनिवार्य किया जाए.
- तय हो जवाबदेही: ट्रांसफर न करने या फाइल को अटकाने वाले अधिकारियों से लिखित में स्पष्टीकरण मांगा जाए.
जब तक इस व्यवस्था में संवेदनशीलता और जवाबदेही नहीं आएगी, तब तक ये महिलाएं ऑफिस में धक्के खाने को मजबूर रहेंगी.. और कागजों में लिखे उनके ‘अधिकार’ केवल फाइलों की शोभा बढ़ाते रहेंगे.