अमेरिका और चीन के बाद भारत अब दुनिया का ऐसा तीसरा देश बन है, जहां किसी निजी कंपनी ने अपने दम पर ऑर्बिटल रॉकेट को लॉन्च किया हो. स्काईरूट एयरोस्पेस ने विक्रम-1 को न सिर्फ लॉन्च् किया बल्कि सफलतापूर्वक उसकी ऑर्बिटल एंट्री भी कराई. अब तक सिर्फ भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ISRO ही ऐसा करता था.
स्काईरूट के इस कदम से ISRO का बोझ तो कम होगा ही, वैश्विक अंतरिक्ष इकॉनॉमी में भारत की ताकत भी बढ़ेगी. हालांकि कंपनी को आगे बढ़ने के लिए बड़े बजट की जरूरत होगी. इसके लिए स्काईरूट को खुद को ऐसे व्यवसाय के तौर पर स्थापित करना होगा, जिससे उसकी कमाई भी हो और देश की भलाई भी.
रॉकेट बनाना अलग बात है और उसे व्यवसाय के तौर पर खड़ा करना अलग बात है. दरअसल स्काई रूट अंतरिक्ष बाजार के जिस क्षेत्र में खुद को स्थापित करने की कोशिश कर रहा है, वह कम चुनौतीपूर्ण नहीं है. आज छोटे उपग्रह प्रक्षेपण का काम अमेरिका और चीन की कई कंपनियां कर रही हैं.
ऐसे में कंपनी के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं. द हिंदू की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2021 में यह अनुमान जताया गया था कि अगले पांच साल में 100 से 500 किलोग्राम वजनी उपग्रहों को रॉकेट से लॉन्च करने की संख्या में बढ़ोतरी हेागी, ऐसा हुआ भी, लेकिन हर कंपनी को समान लाभ नहीं हुआ. हालांकि स्काईरूट के लिए अच्छी बात ये है कि मई 2026 में ही कंपनी को स्पेस टेक यूनिकॉर्न का तमगा मिला है. 60 मिलियन डॉलर की फंडिंग जुटाकर 9000 करोड़ रुपये से अधिक की कंपनी बन गई.
स्काई रूट क्या करती है?
स्काईरूट हैदराबाद बेस्ड भारत की एक प्रमुख निजी अंतरिक्ष टेक कंपनी है. इसकी स्थापना 2018 में पवन कुमारर चंदना और नागा भारत डाका ने की थी. कंपनी की स्थापना से पहले दोनों ISRO में वैज्ञानिक थे. कंपनी को बनाने का उद्देश्य था किफायती अंतरिक्ष यात्रा. कंपनी छोटे उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने की लागत कम करना चाहती है. इसके अलावा कंपनी ऑन डिमांड रॉकेट लॉन्च करने की सुविधा भी दे रही है, जिसे स्पेस कैब सर्विस कहते हैं. विक्रम-1 के साथ कंपनी पहला कदम बढ़ा चुकी है. हालांकि कंपनी का मुख्य तौर पर रॉकेट नहीं बनाती, वह एक्सेज टू स्पेस यानी अंतरिक्ष तक पहुंच देती है. यही कंपनी की कमाई का जरिया है.
कैसे पैसे कमाएगी स्काईरूट?
1- सैटेलाइट लॉन्च सेवा
स्काईरूट कंपनी के लिए कमाई का पहला रास्ता सैटेलाइट लॉन्च सेवा है. कंपनी का मुख्य उद्देश्य भी छोटे उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने की लागत कम करना है. टेक क्रंच की एक रिपोर्ट के अनुसार आज दुनिया भर में हजारों सैटेलाइट लॉन्च किए जा रहे हैं. इनका इस्तेमाल इंटरनेट सेवा, कृषि निगरानी, मौसम पूर्वानुमान, रक्षा निगरानी, मैपिंग और लॉजिस्टिक के क्षेत्र में हो रहा है. हर कंपनी के पास अपना रॉकेट नहीं होता, इसलिए वे स्पेस कंपनियों से ही लॉन्च सेवा लेते हैं. ऐसे लोग स्काईरूट के प्रमुख ग्राहक होंगे. कंपनी ने खुद बताया है कि छोटे सैटेलाइट ऑपरेटरों के लिए एक डेडीकेटेड लॉन्च की मांग मजबूत की गई है. इसमें एक तिहाई ग्राहक भारत से बाकी अन्य देशों से होने की उम्मीद है.
2- राइड शेयरिंग मॉडल
स्काई रूट राइड शेयरिंग मॉडल से भी कमाई करेगी. दरअसल किसी भी कंपनी जो सैटेलाइट लॉन्च करना चाहती है उसे पूरा मॉडल नहीं चाहिए. विक्रम-1 को ही देखें तो ये अपने साथ 350 किलो पेलॉड ले जा सकता है. अगर किसी स्टार्टअप का सैटेलाइट 20 किलो का है तो एक रॉकेट के साथ कई ग्राहकों के सैटेलाइट भेजे जा सकते हैं. पहले मिशन में भी विक्रम-1 छह पेलोड लेकर गया था. इसका मतलब है कि एक लॉन्च में ही कई ग्राहकों से कमाई कमी जा सकती है.
3- रक्षा क्षेत्र
डिफेंस सेक्टर में भी कंपनी कमाई कर सकती है. दरअसल दुनिया भर में सैन्य और रक्षा एजेंसियां अब छोटे सैटेलाइट नेटवर्क पर तेजी से निवेश कर रही हैं. भारत में भी सीमा निगरानी, संचार, समुद्री सुरक्षा और मिसाइल चेतावनी जैसे क्षेत्रों में सैटेलाइट तैनात किए जा रहे हैं. स्काईरूट अगर तेज और कम लागत वाले लॉन्च उपलब्ध कराता है तो उसे रक्षा क्षेत्र से बड़े अनुबंध मिल सकते हैं.
4- स्पेस एक्स की तरह अंतरिक्ष के आगे की सेवाएं
दुनिया में स्पेस के क्षेत्र में काम करने वाली सबसे बड़ी निजी कंपनी स्पेसएक्स है, जिनसे स्टारलिंक इंटरनेट सुविधा शुरू की है. रॉकेट लैब भी एक निजी कंपनी है जो सैटेलाइट और स्पेस सिस्टम बेचती है. ऐसे में एक्सपर्ट ये मानते हैं कि भविष्य में स्काईरूट भी सैटेलाइट प्लेटफॉर्म, मिशन मैनेजमेंट, स्पेस लॉजिस्टिक्स और ऑर्बिटल सर्विसेज के क्षेत्रों में उतर सकता है.
भारत को इससे क्या फायदा होगा?
स्काईरूट कंपनी या अन्य निजी स्पेस कंपनियों से देश की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ेगी. इससे वैश्विक स्पेस इकॉनॉमी में भी भारत का दबदबा बढ़ेगा. टेक क्रंच की एक रिपोर्ट के मुताबिक इसके लिए कंपनी को लगातार लॉन्चिंग करनी होगी. अगर कंपनी साल में सीमित लॉन्च करती है तो कमाई के मामले में उसे मुश्किल आ सकती है. हालांकि भारत की उम्मीद सिर्फ स्काईरूट से नहीं है, 2020 में स्पेस में निजी क्षेत्र की कंपनियों को बढ़ावा देने की शुरुआत करने के बाद से अब तक कई कंपनियां इस क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ रही हैं.