एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, अगस्त 1947 में भारत की आजादी ही नहीं हुई बल्कि देश दो हिस्सों में भी बंट गया। विशाल सिंधु और उसकी सहायक नदियां सदियों से जिस क्षेत्र में बह रही थीं। अब वह दो देश बन गए थे। एक भारत और दूसरा पाकिस्तान। ऐसे में नदियों के पानी के बंटवारे को लेकर दोनों देशों के सामने एक मुश्किल खड़ी हो गई।
दोनों देशों का अस्थायी समझौता
सिंधु नदी प्रणाली में रुकावट को रोकने के लिए बंटवारे के बाद दोनों देशों ने अस्थायी स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट (यथास्थिति बनाए रखने का समझौता) किया, जिससे पानी का बहाव पहले की तरह जारी रहा। यह सिर्फ एक अस्थायी उपाय था। अप्रैल 1948 में समझौते के खत्म होने के बाद पानी पर टकराव शुरू हुआ। खासतौर से पंजाब सरकार ने पाकिस्तान का पानी रोककर इस्लामाबाद की चिंता बढ़ा दी।
भारत और पाकिस्तान ने विवाद को टालने के लिए 4 मई 1948 के ‘इंटर-डोमिनियन समझौते’ पर सहमत हुए। इसके तहत भारत को अस्थायी उपाय के तौर पर सालाना भुगतान के बदले बेसिन के पाकिस्तानी हिस्सों को पानी देना था। साथ ही स्थायी समाधान तक पहुंचने के लिए आगे बातचीत होनी थी। बातचीत और युद्धविराम के बाद मई 1948 में पानी की आपूर्ति बहाल कर दी गई।
अमेरिकी नेता का प्रस्ताव
साल 1951 में अमेरिकी राजनेता डेविड लिलिएंथल ने प्रस्ताव दिया कि भारत और पाकिस्तान नदियों को राजनीतिक विवाद के बजाय इंजीनियरिंग चुनौती के तौर पर देखें और विश्व बैंक इसमें मध्यस्थ की भूमिका निभाए। इसके बाद विश्व बैंक (तब इंटरनेशनल बैंक फॉर रिकंस्ट्रक्शन एंड डेवलपमेंट) ने दोनों देशों के इंजीनियरों, अर्थशास्त्रियों, राजनयिकों और जल विशेषज्ञों से बातचीत शुरू की।
विश्व बैंक की मध्यस्थता में नौ साल बातचीत चली। हर नदी, हर नहर, हर स्टोरेज स्ट्रक्चर (पानी जमा करने का ढांचा) और इंजीनियरिंग डिजाइन पर तकनीकी बहस हुई। दोनों पक्षों की सहमति के बाद आखिरकार 19 सितंबर 1960 को जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने कराची में विश्व बैंक की मध्यस्थता में सिंधु जल संधि यानी IWT पर हस्ताक्षर किए।
सिंधु जल समझौते की रक्षा की जाएगी और इसका जवाब दिया जाएगा। पाकिस्तान सिंधु जल समझौते पर कोई सौदा करने को तैयार नहीं है और जरूरत पड़ने पर जंग भी लड़ने को तैयार है। हम अपने हिस्से का पानी नहीं रुकने देंगे।
बिलावल भुट्टो जरदारी
भारत-पाकिस्तान को तीन-तीन नदियां
इस समझौते ने नदी प्रणाली का बंटवारा कर दिया। भारत को तीन पूर्वी नदियों- रावी, ब्यास और सतलुज पर विशेष अधिकार मिले। पाकिस्तान को तीन पश्चिमी नदियां- सिंधु, झेलम और चिनाब मिलीं। भारत को मिली पूर्वी नदियों में सालाना 33 मिलियन एकड़-फीट (MAF) पानी बहता है। पाकिस्तान को मिली पश्चिमी नदियों में 135 MAF पानी बहता है। यानी पाकिस्तान को सिंधु नदी प्रणाली का 80 प्रतिशत और भारत को 20 प्रतिशत पानी मिला।
भारत को अपनी सीमा के भीतर उन पश्चिमी नदियों के सीमित इस्तेमाल की अनुमति मिली। इसमें घरेलू इस्तेमाल, तय सिंचाई, तय सीमा के भीतर भंडारण और कड़े इंजीनियरिंग नियमों के अधीन ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ पनबिजली परियोजना शामिल थीं। इस समझौते ने स्थायी सिंधु आयोग भी बनाया। इससे यह सुनिश्चित हुआ कि दोनों देशों के अधिकारी नियमित रूप से मिलते रहें, भले ही राजनयिक संबंध खराब हो जाएं।
भारत में उठे संधि पर सवाल
भारत ने नदियों के बंटवारे के बाद पाकिस्तान को वैकल्पिक नहरें और पानी का बुनियादी ढांचा बनाने में मदद करने के लिए 62 मिलियन पाउंड देने पर सहमत हुआ। ऐसे में जब इस समझौते पर हस्ताक्षर किए गए तो भारत में विपक्ष के कई लोगों ने इसे असमान और अनुचित बताकर इसकी आलोचना की। भारत में विपक्षी दलों ने इस समझौते को बराबरी का नहीं माना था।
आलोचकों का कहना था कि इस संधि ने भारत के अपने इलाके में विकास के मौकों को सीमित कर दिया, जबकि पाकिस्तान को बेसिन के बड़े हिस्से तक पक्की पहुंच दे दी। यह बहस दशकों तक चलती रही लेकिन संधि में कोई बुनियादी बदलाव नहीं हुआ। यह 1965 और 1971 की लड़ाइयों और 2001 और 2008 के आतंकी हमलों के बाद भी ये संधि जारी रही।
भारत-पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि को कभी बहाल नहीं करेगा। सरकार राजस्थान से पाकिस्तान की ओर बहने वाले अतिरिक्त पानी को निकालने के लिए एक नहर का निर्माण करेगी। आतंकवाद के खिलाफ सरकार की शून्य सहिष्णुता की नीति बरकरार है।
अमित शाह
पहलगाम से बदली चीजें
सिंधु जल संधि में सबसे अहम मोड़ अप्रैल, 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद आया। इस हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित करने का ऐलान कर दिया। इस पर पानी भड़क गया और आरोप लगाया कि भारत पानी को हथियार बना रहा है। पाकिस्तानी नेताओं ने पानी रुकने पर भारत को युद्ध की गीदड़भभकी तक दे डाली।
पाकिस्तान ने इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाना शुरू किया और इसे मध्यस्थता अदालत के सामने ले गया। अदालत ने फैसला सुनाया कि संधि में एकतरफा स्थगन का कोई प्रावधान नहीं है। यह फैसला पूरी तरह से पाकिस्तान के पक्ष में था लेकिन भारत ने इस फैसले को खारिज कर दिया। भारत ने अदालत के गठन को भी गैर-कानूनी बता दिया।
भारत के प्रोजेक्ट
पाकिस्तान के अदालतों का दरवाजा खटखटाने के बीच सिंधु संधि का भविष्य क्या होगा, ये इन नदियों पर नए प्रोजेक्ट तय कर सकते हैं। मौजूदा समय में दुनिया का ध्यान IWT पर कानूनी तर्कों से हटकर इंफ्रास्ट्रक्चर पर आ गया है। खासतौर से भारत का चिनाब-ब्यास लिंक टनल पाकिस्तान को चिंतित कर रहा है।
भारत ने हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स को तेजी से आगे बढ़ाते हुए साफ संकेत दिया है कि वह अपने इलाके में मिलने वाले हर अधिकार का पूरा फायदा उठाना चाहता है। भारत के लिए ये उस समझौते का फिर से मूल्यांकन है, जो बहुत अलग भू-राजनीतिक हालात में किया गया था। दूसरी ओर
पाकिस्तान में इन घटनाक्रमों को गहरी चिंता के साथ देखा जा रहा है क्योंकि उसकी खेती बड़े पैमाने पर पश्चिमी नदियों पर निर्भर है। पाकिस्तानी नेताओं के बयानों में ये चिंता या बौखलाहट साफ देखी जा सकती है।
